00:00जारखन की राजधानी के हिरदय में इस्तीत शहिदिस्थल, जिलाइस्कूल परिशार और सहीद जोक के समीब केवल एक एतिहासे किसमारक नहीं, बलकि वो पवीत्र भूमी है जहां 1857-1858 के स्वतंतरता संग्राम में मात्र भूमी के लिए प्रान और पीत करने वाले वीरों क
00:30के बाग से जब से मुझे होस है मैंने अपने पिता जी पांडितार किश्वनाथरा है जी के शाच सहीद इस्थल जाना सुरू की उनके मीत्र थे जुगल बाबू और उनके भाई लोग स्वतंता से नानी का वो भी परिवार था वहाँ पर एक सहीद समारक बनाए गया एक्�
01:00लड़ाही जो हुई स्वतंता आंदोरन उसको हमारे दादाची के दादाजी थे शहीद पांडे गनपत्राय जो मुक्ति वाहिनी सेना थी उसके कमांडर इंचीफ वो बनाया गया थे उनकी अगवाई में या लड़ाही लड़ी गई और डाल्टन कमिशनर जो थे वो उनके
01:301857 के संग्रा में जपुरदेश में आजादी की ज्वाला धधक रही थी राची ने भी अपने वीर शपुतों का रक्त मात्रे भूमी के चर्नों में अर्पित किया
01:4216 अप्रिल 1858 को ठाकुर विश्वनास सहदेव और 21 अप्रिल 1858 को पांडे गनपतराई को इसी परिसर में खड़े एक विशाल कदम के पेड़ पर फासी दी गई
01:53मृत्तु के वाद उनके सबों को पास के एक प्राचीन कुए में डाल दिया गिया यह कुआ आज भी मौन होकर इतिहास की गवाही देता है
02:02मानो कह रहा हो यहां कभी वीरों ने राष्ट की सुतंतरता के लिए अपने जीवन को हस्ते हस्ते त्याग दिया
02:09कि जब वहाँ फासी के संक्या बढ़ जाती थी तो वहाँ से उस लास्कुला के कुआ मड़ दिया जाती है यही वही कुआ है
02:19इसे संगरक्षित भी रखा गया है इनका यहां पर इस पहले छोड़ था इस्व मरमत किया गया है और इस कुआ से बहुत व्लोग का पानी कभी ने कभी ने सुकता एक ऐसा धारा है कि कि इतना हो गड़ी पर जागा तो यहां पर इक गड़्धा में जो बाल्टी ढूमने प
02:49अठासी से हैं और उसे दर्यान बहुत गर्मी पाड़ा बनी कुमा सुखा लेकिन यहां हम लोगा पाने के कमी ने हुआ कि देखिए यही है वो कुआ जो कहा जाता है इतिहासकार कहते हैं कि जब यहां पे अपने सतंत्रता सेनानियों को फासी पर चढ़ाया जाता था उसके
03:19अपने सबों के सेंग्या बढ़ने लेगी तब इस कुए में आकर उन सबों को फेका जाता था यह हमारे लिए किसी धार्मिक धरोहर से कम नहीं
03:29अंग्रेजों के द्वारा कुरूरता किये गए एक प्रती के एक चिन है लेकिन यह हमारे लिए धार्मिक और इतिहास के धरोहर है यहीं वो कुआ है जहां सोतंत्रता सेनानियों के शव को फेका जाता था
03:49हमने अपने लोगों से सुना है कि जो कुआ है वहाँ पर भी वो फासी कुआ के नाम से प्रसिद्ध था वहीं पर लोगों को जो फासी दी जाती थी या जिस विड़ी से भी सजा मिलती थी उसको वहाँ डाल दिया जाती था
04:07इतिहासकार और शहीदों के पुरवज बताते हैं कि इन वीरों की किरपतारी में कुछ स्थानिय गद्दारों की भुमिका रही अंग्रेजियों को रामगर से खदरने के बाद जब ये सिनानी राची लोटे तो गुप्त सुचना पर अंग्रेजों ने घिरावंदी की
04:21गद्दारी के अंधकार के बावजूद इन वीरों का साहस और संकल्प इतना प्रखर था कि उनका नाम आज भी सुतंतरता के स्वर्नक्षरों में दर्ज है
04:31जो यहां के यह थे Commissioner Dalton और जो अपने सरकार से उन लोग पयतरा चाहँ कर रहे तो उस चहत्रा की लड़ाई के बाद
04:43और कैसे उनको पकड़ा जाना है कैसे मारा जाना है इन लोग पर इनाम घुषिट किया गया था तो इनाम के लालत से पकड़े नहीं जाते लेगिन यह
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05:30आजादी की कीमत खून और बलिदान से चुकाई गई है शहीद चौक भी इस गौरब गाथा का अभिन हिस्सा है यहीं अंग्रेजों ने कई सुतंतरता सेनानियों को गोलियों से चलनी कर दिया था यह चौक आज भी उन अमर बलिदानों की प्रतिध्वनी को संजोए हुए है
06:00वहाँ भासी का भंधा उनको लगी थी शहीद पंडेगन पत्राय को तो भासी का भंधा वहाँ लगाया गया और वह इसलिए बनाया गया है कि ताकि जारखंड के में जो इतने बड़े शहीद हुए उनको आते जाते बच्चे और यहाँ के लोग जीवन्त रखे उनको या�
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