00:00पिता जी जल्दी चलिए वन्ना मैं आज स्कुल में देरी से पहुचूंगा, मेरी टीचर बहुत गुसा करती है।
00:11हाँ हाँ बेटा अभी चलते हैं, बस दो मिनिट रुको, तब रमेश की पत्नी कमरे से बाहर आती हैं और रमेश से कहती हैं, सुनिये जी, आज शाम को आप आफिस से जल्दी घर आ जाईएगा, यादे न, आज आपको मुझे शॉपिंग कराने के लिए लेकर जाना है।
00:41अगले मैंने पक्का शॉपिंग कराने ले जाऊंगा, अभी मुझे चलना चाहिए, वरना राजुको स्कूल पांचने में देर हो जाएंगी।
00:47देखे जी, अब आपके ये बहाने पुराने हो चुके हैं।
00:52मैं कुछ नहीं जानती, आज शॉपिंग करने जाना है, मतलब जाना है, आगे आपकी मरसी।
00:59अच्छा ठीक है भागिवान, अब तुम पूरा घर सर पर मत उठाओ, मैं कुछ करता हूँ।
01:06इतना कहकर रमेश, अपने बेटे राजुको लेकर वहाँ से चला जाता है।
01:11घर से निकलने के लिए रमेश जैसे ही अपनी मोटर साइकल शुरू करता है, तब ही उसकी माँ उसे आवाज दे कर कहती है।
01:41अरे तेरा दिमार तो खराब नहीं हो गया, मैंने तेरे भरोसे मंदिर के पुजारी जी से बादा कर दिया है, और तू कह रहा है कि पैसे नहीं है, अब मैं पुजारी जी को क्या जवाब दूँगी, तुझे तो मेरी इस्जत की भी कुछ परवा नहीं है।
01:56अच्छा ठीक है मा, अब तुम गुसा मत करो, मैं शाम तक कुछ इंतिजाम करता हूँ।
02:03इतना कहकर रमेश वहां के चला जाता है।
02:06फिर दोपेर को जब रमेश अपने दफ्तर में बैठा होता है, तब उसे अपनी पत्नी और मा की बाते याद आती है।
02:13रमेश अपने दफ्तर के एक साथी मोहन से कुछ रुपए उधार मांगता है।
02:18अरे भाई मोहन, मेरा एक छोटा सा काम कर दो, मुझे कुछ रुपए की सक्त जरूरत है, मुझे कुछ दिनों के लिए क्या तुम रुपए उधार दे सकते हो।
02:28अरे रमेश भाई, मैं तुम्हे पैसे उधार तो दे सकता हूँ, लेकिन मुझे वक्त पर पैसे लौटा देना।
02:36वैसे भी मेरा मानना है कि दोस्ती यारी में कभी पैस होगा व्यवार नहीं करना चाहिए।
02:42ये कावत तो तुमने सुनी होगी कि उधार प्रेम की कैंची है, मैं नहीं चाहता कि पैसो को लेकर हमारा रिष्टा खराब हो।
02:51अरे मोहन, तुम बिल्कुल चिंदा मत करो, मैं तुम्हारे पैसे वक्त पर लौटा दूँगा।
02:58फिर मोहन, रमेश को पैसे दे देता है। शाम को घर आकर रमेश कुछ पैसे अपनी मा को देता है और साथ ही अपनी पत्नी को भी शौपिंग कराने बाजार लेकर जाता है।
03:10रमेश की पत्नी और उसकी मा का स्वभाव जरूरत से ज्यादा खर्चिला होने की कारण, दोनों हमेशा बेवज़ा पैसे खर्च करती हैं।
03:19फिर एक दिन…
03:21सुनिये जी, अगली हफते हमने चुटियों में कहीं बाहर जाने का प्लान बनाया था।
03:26आपने पैसों का इंतिजाम कर लिया ना?
03:28अरे अभी कहां, अभी तो मेरे पास बिल्कुल पैसे नहीं है, हम कभी और चले जाएंगे।
03:34इतना कहकर रमेश के पत्नी वहाँ से चली जाती है।
03:51वहीं दूसरे तरफ रमेश की मा भी तेर्थ यात्रा जाने की जिद्ध करती है और रमेश से पैसे मांगती है।
03:58फिर अगले दिन रमेश एक सेट से पैसे उधार लेकर अपनी पत्नी और बेटे को भुगमाने ले जाता है।
04:05और अपनी मा को भी तिर्थ यात्रा पर भेज देता है।
04:08लेकिन जैसे ही रमेश अपनी चिटिया बिटा कर वापस आता है, कर्जदार उसका जीना मुश्किल कर देते हैं।
04:14इतना ज्यादा कर्ज एक साथ अपने उपर देख, रमेश काफी परिशान रहने लगता है।
04:20फिर एक दिन, राजु की स्कूल की फीज वक्त पर न भर पाने के कारण रमेश को स्कूल में बुलाया जाता है।
04:41अपने दोस्त गिर्धारी से कुछ पैसे उधार ले लेता है, और स्कूल की फीज भर देता है।
04:47रमेश की मा और उसकी पत्नी, खर्चे और घर की जिम्मदारी संभालते दीरे दीरे रमेश पूरी तरह कर्ज में डूप जाता है
04:57और तभी एक दिन दफ्तर में काम करते समय रमेश की तब्यत अचानक बिगर जाती है और वो बेहोश होकर गिर पड़ता है
05:05उसे जल्दी से पास के एक अस्पताल में भरती कराया जाता है
05:09रमेश के घरवालों को ये बात पता चल जाती है तो वे सभी अस्पताल पहुँचते हैं
05:15अस्पताल के डॉक्टर साहब उने बताते हैं
05:18देखिए देर रात तक जागने और जरूरत से ज़्यादा काम करने की वज़े से इन्हें चक्करा गया था
05:24बैतर यही होगा कि इन्हें कुछ दिनों के लिए पूरी तरह आराम करने दिया जाए
05:30रमेश की हालत देकर उसके बेटे राजु को बहुत गुस्सा आता है
05:34और वो अपनी दादी और मा से कहता है
05:36मा दादी मैं इतना चोटा हूँ फिर भी मैं इतना समझता हूँ कि पिताजी दिन रात दफ्तर में काम करके पैसे कमाते हैं
05:46पिताजी अकिला पूरा घर संभालते हैं और आप दोनों अपने फिजल की खर्चों के लिए उन पर दबाव डालते रहते हैं
05:54आज पिताजी की आलत के जिम्मेदार तो आप दोनों है
05:58राजु की समझदारी भरी बाते सुनकर रमेश की मा और पत्नी को अपनी गल्दी का एसास होता है
06:05और दोनों की आखों में आसु आ जाते हैं
06:09फिर कुछ दिनों के बाद रमेश की तब्रत एक दम अच्छी हो जाती है
06:13और वो पहले की तरह अपने काम पर जाने लगता है
06:16रमेश की मा और पत्नी अब उसे किसी प्रकार की कोई तकलिफ नहीं देते
06:20और ना ही उससे किसी चीज की मांग करते हैं
06:23फिर देखते ही देखते रमेश अपने कर्स की सारे पैसे चुका देता है
06:27उसके जिन्दगी पहले की तरह अच्छी हो जाती है और वो अपने परिवार के साथ खुशी-खुशी रहने लगता है
06:34शिक्षा हमारे रिष्टे एक तराजू की तरह होते हैं जिसकी दोनों और जिम्मेदारी और समझदारी का वजन बराबर होना चाहिए
Comments