00:00साई बाबा या चान्द मिया
00:04अलखंदो लिल्लाहे रद्दिल आलमीम वसलादो वसलामो अला रसूलेही मुहम्मद यूफ वालेही वफ असहारेही आजमन।
00:20हिंदू धर्म के महा गुरूने साई बाबा को चान्द मिया एक मुसल्मान का नाम दे दिया है
00:25ये तो सबको पता है, लेकिन क्या है इस बात के पीछें की स्टॉरी ये शायद आपलों को नहीं पता हो
00:30स्विवाद के पिछे की क्या बज़ा ऐसा हो सकती है??没लिये जान वोक्स में..
00:50क्यूं साही बाबा को खास तौर पर मुसल्मान धर्म से ही जोड़ा जा रहा है?
00:54इतने मंदिर होने के बावजूद भी वो मस्जित में ही क्यूं रहा करते थे?
00:58उनके सबसे खास लोगों में एक मुसल्मान शफ्स ही क्यूं था जिसका नाम था नानावनी?
01:03और वो क्या सोच रखते थे इसलाम धर्म के लिए?
01:06हिंदू परंपरा के हिसाब से उनके मरने के बाद जलानी की बज़ाए उनके शरीर को क्यूं दफलाया गया था?
01:13तो आये बिना देर के शुरू करते हैं साही बाबा के जिन्दगी से जुड़े इन सवालों को
01:18साल 1918 जब मंबई को बंबई नाम से जाना जाता था तब एक मशूर फोटोग्राफर हुआ करते थे जिनका नाम था एसेस देवरे
01:26कई मशूर लोगों की तस्वीर खीच चुके थे एसेस देवरे
01:29एक दिन की बात है एसेस देवरे ने अपने सामने बैठे एक फकीर की तस्वीर खीची वो फकीर जो जीते जी एक ईश्वर का दर्जा पा चुका था
01:38जिसे देखने उस जमाने में पूरे हिंदुस्तान से लोग आया करते थे और वो थे शिर्डी के साई बाबा
01:43ये वही तस्वीर है जो आज भी हजारों लाखों घरों में तंगी रहती है
01:48शिर्डी महराश्टर के अहमद नगर में पढ़ने वाला एक चोटा सा गाउ हुआ करता था अलाकि साई बाबा खुद शिर्डी से बिलॉंग नहीं करते थे
01:56उनका जनम कहा हुआ कैसे हुआ इस बारे में उन्होंने खुद से कभी नहीं बताया
02:00सब कही सुनी बातों के बेस पर ही कहा बताया जाता है उनके बारे में
02:04एक किताब थी जो साई बाबा के जिन्देगी पर लिखे गई थी बाए एनफोनियो रिगपॉलिस
02:10वो अपनी इस किताब में बताते हैं कि येर 1855 के आसपास 16 साल की उमर में साई बाबा शिर्डी पहुंचे
02:17कहानियों के एसाप से वो सिर्फ 3 साल शिर्डी में रहे और अचानक से घायब हो गए
02:22फिर 1858 में वो वापस शिर्डी आये उस वख तक भी साई बाबा का नाम कोई नहीं जानता था
02:28ऐसा कहा जाता है कि वहाँ के मंदिर के एक पुजारी ने उन्हें ये नाम दिया साई बाबा और धेरे धेरे वो इसी नाम से मशूर होते चले गए
02:361858 से लेकर अगले 60 सालों तक साई बाबा शिर्डी में नहीं रहे पर धेरे धेरे उनके नाम पर ये बाते चलने लगी कि वो चमतकार कर सकते हैं इसलिए दू दूर से लोग उनके दर्शन के लिए आने लगे
02:48अब कहानी को मैं यहां रोप कर आपको साई बाबा की कुछ अस्तिरी तस्वीरे दिखाता हूँ जो साल 1900 से लेकर 1918 की बीच खिची गई थी तस्वीर में साई बाबा भिक्षा मांगते दिखाई दे रहे हैं यह तस्वीर शिर्डी के दो घरों के बीच से खिची गई थी ज
03:18पर दाल जमा करते थे इसके साथ साथ उनके पास एक टीन का डबबा होता था
03:22जिसमें वो दूद, दही जैसे लिक्विड फॉर्म में चीजों को रखते थे
03:26यह दूसरी तस्वीर में साई बाबा दुआई कमार के साँने बैठे हुए दुाई कमार एक मस्जट थी
03:31जहां साई बाबा रहा करते थे
03:33इस तस्वीर के बीचे एक दिल्चस्प कहानी है
03:35यह तस्वीर साई बाबा के एक भक वासुदेव सदाशिव जोशी ने खीची थी
03:39कहते हैं कि जोशी ने अपने दो चिदंबर राउ को दस रुपे दिये
03:43और उनसे कहा कि वो जाकर ये पैसे साई बाबा को दे दे दे दक्षना के रूप में
03:47और उनकी एक तस्वीर खीच के ले आए
03:49चिदंबर राउ द्वाई का मार तो गए और दक्षना भी दे दी
03:53पर तस्वीर खीचने के लिए वो हिम्मत नहीं जुटा पाए
03:56लोग कहते हैं कि साई बाबा ने चिदंबर राउ की मन की बात को जान लिया
04:00और खुछ से ही कह दिया कि वो उनकी तस्वीर खीच सकते हैं
04:03पर शर्त ये तस्वीर वो बिजनस के लिए इस्तिमाल ना करें
04:06ये तीसरी तस्वीर है साल 1903 की
04:09जेने पुने के काशिनाद गोडे ने खीचा था
04:12ये तस्वीर वो धुनिमाई के सामने बैठे हैं
04:14धुनिमाई को पवितर स्थान कहा जाता है जहां आंग जलती रहती है
04:181903 की एक और तस्वीर जहां वो लोगों के साथ दिखाई दे रहे हैं
04:22इस तस्वीर को खीचा था एहमद नगर के कोपाल स्टूडियो के एक फोटोक्राफर ने
04:27ये है पाँशवी तस्वीर जो 1906 में खीची गई थी
04:31इस तस्वीर में साई बाबा देवार से टेक लगा कर खड़े हुए हैं
04:34ये तस्वीर भी काशिनाद गोड़े नहीं खीची थी
04:37ये तस्वीर में साई बाबा अपने दो भक्तों के साथ खड़े हैं
04:40जिनका नाम है नाना साहेब निमोनकर उनकी राइट साइब में
04:43और गोपाल रौ मुकुंड राउ उनकी लेफ्स साइब में
04:46ये तस्वीर शीरी में जगह है लेनी बाग वहाँ खीची गई थी
04:49लेनी बाग वो जगह है जहां साई बाबा रोज दिन में दो बार ध्यान करने जाते थे
04:54ये छटी तस्वीर 1915 की है जो साई बाबा के आश्रे दिनों में खीची गई थी
04:59ये तस्वीर में साई बाबा अपने करेबी भक्त के साथ दिखाई देते हैं
05:02ये तस्वीर द्वाई कमार मस्जित की सीडियों पे ले गई थी
05:05दिखाई दे रहे हैं साई बाबा के साथ अब्दुल, ताधिया कोटे पाटिल और नाना वली
05:10ये तानों साई बाबा के सबसे वफ़ाधार और करीबी लोग थे
05:14अब्दुल और पाटिल दोनू ही घरीब परिवार से थे
05:17उनने बच्छपन में ही साई बाबा की देकरेक में दे दिया गया थइ
05:21उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी साई बाबा की खिदमत में गुजारी
05:24और नाना वली को तो लोग साई बाबा की सेना का जिनरल मानते थे
05:27एक तरह से लीडर कह सकते हैं।
05:31अब हम वापस हमारी कहाने की तरफ लौटते हैं
05:33साल 1918 अक्टूबर का महीना था
05:36साई बाबा की तबियत अचाना खराब रहने लगी
05:39उन्होंने खाना पीना काफी कम कर दिया था
05:41और अपने भक्तों को कह दिया
05:43कि वो जल्दी ही इस दुनिया को छोड़ कर जाएंगे
05:45इसके बाद 15 अक्टूबर 1918 में ही
05:49साई बाबा ने दुनिया को अलविदा कह दिया
05:51मौत के बाद उनके शरीर को भूटी वाड़ा में दफनाये गया
05:55जिसे आज समाधी मंदिर के नाम से जाना जाता है
06:02अब उनकी मौत के बाद उनकी लोक प्रियता में
06:05और जबरदस्ट इजाफा हो गया
06:07विदेश विदेश में कई सारे मंदिर बनाएगे
06:09और सारे देशों में जो मौर्ती लगाए जाती है
06:11वो 1918 की वो तस्वीर के आधार पर बनी है
06:14जिसके बारे में हमने आपको वीडियो की शिरुवात में बताया था
06:17तो दोस्तो ये थी कुछ खास जरूरी बाते
06:19साई बाबा की जिन्दगी से जुड़ी
06:21उन्होंने हमेशा लोगों की मदद की
06:23उनका धरम, नाम और जात को जाने बगएर
06:25कई बार उनसे उनकी धरम के बारे में लोगों ने पूछा
06:27पर हर बार उनका एक ही जवाब था
06:29कि सबका मालिक एक है
06:31मतलब की वो भी सिर्फ
06:33एक ही खुदां में यकीन रखते थे
06:35तो दोस्तों कैसा लगा आपको वी वीडियो
06:37अगर पसंद आया तो प्लीज लाइक करें शेयर करें
06:39और मेरे चैनल को ज़रूर सब्सक्राइब करें
06:41क्योंकि हिस्ट्री से रेलेटेट
06:43अगली कहानी में
06:45मिलता हूँ
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