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  • 9 years ago
खुश हूँ की किसी की महफिल में अर्ज़ां थी मता-ए-बे-दारी
अब आँखें हैं बे-ख्वाब तोे क्या अब ख्वाब हैं बे-ताबीर तो क्या

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