बोलने की स्वतंत्रता पर कोई शासक अंकुश लगाने का तभी प्रयास करता है जब उस शासक तो भय होता है के बोलने वाले के सत्य को सुनकर जनता उसके विरुद्ध ना हो जाए.
लोगों की बोलने की स्वतंत्रता पर रोक लगाने से शासक की अपनी ही कमजोरी प्रकट हो जाती है. उसमे सत्य सुनने का साहस नहीं होता है.
हो सकता है के किसी विचार में बहुत थोड़ा ही सत्य हो पर जब तक बहस करने की आज़ादी ना दी जाए तो सत्य और झूठ में फर्क निकालना आसान नहीं होता.
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