00:00मजबूर करोगे तो एक बूंद पानी भी नहीं देंगे
00:04हाँ, प्यार में अपनी जान भी देंगे
00:11मचली के वारे में क्या कहते है कबीर साहब हमारे
00:13एक सनेही माचरी और दूजा अलप सनेह
00:18सनेह माने प्रेम, मचली
00:23एक मचली ही है जो प्रेम जानती है
00:26उदारन दिया है, रुपक के तौर पर बनाया है
00:29एक मचली ही है जो प्रेम जानती है
00:31एक सनेही माचरी, दूजा अलप सने
00:33अलप माने अलप, कम
00:34वह बाकी सब प्रेम जानती ही नियोंका प्रेम छोटा है
00:39जियों ही जल से बीचुडे जट से त्यागे देह
00:43वो कहती है जीऊंगी तो सागर में आजाज जीऊंगी
00:47यहीं प्रेम है मेरा इसी सागर से मुझे प्रेम है
00:49सागर उसकी मुक्ति है जहां चाहे वहां जाती है
00:52जैसे ही मुझे तुम सागर से बाहर निकालोगे
00:55मैं जीऊंगी ही नहीं निकालो बाहर
00:57तुम यह नहीं कर पाओगे कि मुझे गुलाम भी बना लो और जिन्दा भी रख लो
01:01यह नहीं हो पाएगा
01:02मुझे जिन्दा रखना चाहते हो तो मुझे आजाद जीने दो
01:06हमारा तुम्हारा साथ चल सकता है
01:09लेकिन गुलामी में नहीं चलेगा
01:17अब ठीक है醒
01:20यह ताने खाना, बब जाना, जुक जाना तलवों में तेल लगाना
01:26यह किस कोटी की बाते हैं और क्यों ही ने झ्हिलना पड़ रहा है
01:31और मैं कहरा हूं तलवों में नहीं पूरे शरीर में तेल लगाओ
01:35बेशक लगाओ
01:36लेकिन प्रेम से लगाओ
01:38मजबूरी से नहीं
01:43मजबूर करोगे तो एक बूंद पानी भी नहीं देंगे
01:48हप प्यार में अपनी जान भी देंगे
01:56मजबूरी में किया गया काम
01:58न प्रेम होता है न कर्तव्वे होता है न धर्म होता है
02:03वो सिर्फ एक बिके हुए गुलाम की गुलामी होता है
02:07प्रेम, कर्तव्य धर्म ये बड़े उचे शब्द है और इनका संबंध सोतंत्रता से जो सोतंत्र होता है वही प्रेम कर
02:15सकता है जो सोतंत्र होता है कर्तव्य पालन और धर्म पालन सिर्फ वही कर सकता है जो बेडियों में जकड़ा
02:21हुआ है आप उसको आग्या दे रहे हो चल �
02:23ये कर चल वो कर और वो आपकी आग्या का पालन कर रहा है तो आप ये थोड़ी कोगे कि
02:27अपना धर्म निभा रहा है जूठी बात