00:00रतनाकर डाकू पता है कौन था, जिनको बाद में हम जानते हैं वालमी की के नाम से, तो बढ़ियां चल
00:09रही थी जिंदगी, जंगल पर उसका एक शत्र राज्य था, आते जातों को लूपता था और बड़ा डाकू था भई,
00:18अब ये जो मस चलती जिंदगी थी, इसमें अचा
00:22आनक अवरोध आया, एक दिन जंगल से एक साधू गुजर रहे थे, इनको लूटने के लिए भी डाकू खड़ा हो
00:33गया, साधू ने उकसा दिया था रतनाकर को, रतनाकर को उवेश हो करके वो सवाल पूछना पड़ा पत्नी से, जो
00:41आम तोर पे किसी पत्धी को अपनी पत्
00:52होली रख दी थी, कि रतनाकर मजबूर, रतनाकर ने कहा, ये सब जो मैं कर रहा हूँ, दुनिया का गला
00:58काटता हूँ, सब को लूटता हूँ, ये तो पक्का है, कि नर्क में गिरूँगा, तो चलेगी मेरे साथ, तेवर से
01:07पूछा था, पत्नी समझ गई कि आज जूट नही
01:14रक्तिम, और आखें खूनी लाल-लाल हो रही है, खिलवार नहीं किया सकता हूँ, उसने बोल दिया, या कहिए उसके
01:22मूँ से निकल गया, कि नहीं, नर्क वर्क तो तुम अकेले ही जाना, रतनाकर फट गया अंदर से उसी समय,
01:31उसकी चेतना, उसका विश्व, उसका आंतरिक
01:36जगत सब चिथड़े चिथड़े हो गया, मर गया रतनाकर, वालमी की कजन्म हो गया, तुम वो मुद्दे छूना ही नहीं
01:46चाहते, तुम वो सवाल उठाना ही नहीं चाहते, जहां तुमको पता है कि गंदगी चुपी है, जहां तुमको पता है
01:55कि सच्चाई चुपी है