राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाच्या शताब्दी वर्षानिमित्त नागपूर महानगरात विजयादशमी उत्सवाचे आयोजन करण्यात आले आहे. या कार्यक्रमाला सरसंघचालक मोहन भागवत उपस्थित राहणार आहेत. संघाच्या शताब्दी वर्षातील या विशेष दसरा उत्सवाकडे लक्ष लागले आहे.
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00:00आज के कारिक्रम के प्रमुकतिती अधरणिय संजय जी गुप्ता, विदर्भप्रांत के माननिय प्रांत संगर चालक जी, माननिय महानगर संगर चालक
00:20जी,
00:22इस कारिक्रम के निमित विशेश रूप से इसको देखने के लिए पधारे हुवे माननिय आति थी गण परमश्रद्धे संतवृंदा उपस्थित
00:38नागरिक सज्जन माता भगिनी एवं आत्मिय स्वहिंसेवक बंदू
00:47इसले साल भर शताब्दी के निमित कारिक्रम चले हैं और उसके समापन के अवसर पर विज्यादश में उत्सव मनानी के
00:57लिए आज हम यहां पर इकत्रित हैं
01:01यह वर्ष संत शिरोमणी जिनको कहते हैं ऐसे पूज संत रविदाजी महराच का 650 वा वर्ष चल रहा है
01:16उसके निमित्त देश में कारक्रम चल रहा है संगती शाखाओं पर भी सर्वत्र रविदाजी के जीवन के कार्य और उनके
01:25जीवन की जानकारी देने वाले कारक्रम चल रहे हैं
01:31जब अपना देश अत्याचारी विदेशी आकरमकों से पीडित था यहां अपने स्वधर्म पर चलने वाले नागरिकों पर उनके अत्याचार हो
01:42रहे थे
01:42सर्वत्र आतंक का वातावरण था ऐसे समय में संतर अविदाजी ने स्वधर्म निष्ठा सामाजिक समरसता और भक्ती का प्रचार धडल्ले
01:55से किया
01:56अपने जीवन के उदारण से उन्होंने उस समय के समाज में और एक प्रकार से धीरज बंदाया हिम्मत बढ़ाई और
02:08उनकी गुणवत्ता को कायम रखा
02:11ऐसे ही स्वधर्म रक्षा के लिए अपना बलिदान करने वाले दो महापुरुषों का भी स्मरण आज करना समीचीन होगा
02:19क्योंकि आर्यसम आज के प्रकार सन्यासी उत्तम शिक्षाविद और शुद्धिया अंदोलन के जनत स्वातंतर सेनानी
02:33स्वामी श्रद्धान अंदे जी के बलिदान को सवसाल पूरे हुए है उसी प्रकार से उड़ी सामे वनवासी बंदूओं के बीच
02:43में रहकर उनकी सिवा में अपना जीमन लगा देने वाले
02:47और वही पर स्वधर्म रक्षा का उनका बहुत जगाते जगाते जिनका बलिदान हो गया ऐसे स्वामी लक्ष्मना नंजे जी सरस्वत्ति
02:56महराज के भी जन्मशताब्दी अभी चल रही है
03:00महत्मा फुले जी का भी दोसोवा वर्ष पिछले अक्रा 11 एप्रिल से शुरू हो गया है ऐसे ही आत्मबोत को
03:10जगाने वाले बंगाल के श्रीमत राजनारायन जी बसू जिन्नों ने अपने समाज के संगटन की एक परिकलपना सामने रखी थी
03:20और स्वा का बोत जगाने के ल
03:29से लिए ठाप, उन्का भी दोस वा वर्षट चल रहा है। इनका स्मरन करना इसलिए भी समीचीन है कि संग
03:38काने सब्क्रारों से शुल रहा है वां इसे श्वा को जगाने का काम है। इस श्वा के अस्मिता के यावार
03:49इज्थास के अधार पर भारत को संगटित बलसंपन करन
03:54के लिए चला है अभी पंच परिवर्तंगा उल्लेख हमारे मांजिये प्रांत संगेचालग जी ने अपने प्रस्ताव नामी किया उसमें जो
04:03एक पहल है वो यही स्वबोध हो स्वदेशी के आचरण की पहल है क्योंकि यह स्वबोध
04:16जिसका प्रत्यंतर हमको संविदान की प्रस्तावना में उद्देशी का में आता है जहां हमने अपने आपको हम भारत के लोग
04:25ऐसा कहा है
04:27वो हमारी जो हम भावना है वो जो हमारा स्व है वो हमारा भावनात्मक बंदन है जिससे इतनी सारी विविज़ताओं
04:39से भरा हुआ देश प्राचीन समय से एक देश एक समाज एक राष्टर के नाते चलते आया है
04:48क्योंकि हमारे पूर्वजों के पास एक अनुभूती थी संपूर्ण अस्थित्व के एक अता की और उस अनुभूती के आधार पर
04:57अपने पंका व्यवहार प्रवर्थित करने वाले अनेक सोपानों से बने हुए उत्कृष्ट तत्वत न्यान के भी हम विरासतदार है
05:10हम इसको भूल गए तब हमारा पतन हुआ हम विबादित हो गए और दुर्बल हो गए और फिर इतने नीचे
05:24गिरते चले गए कि सेकड़ों वर्षों की गुलामी हमको जहलनी पड़ी
05:30अब उस गुलामी से हम अनेक लोगों के महापुर्शों के भीम प्रयासों के बाद और बलिदानों के बाद
05:39मुक्त होकर अपनी एकता और प्रगती के रहा पर चल पड़े है तो
05:44उस हमारे भावनात्मक बंधन को जिसको उत्तरोतर पक्का बनाने का निर्जेश अपने समिधान में ही मारगदर्शत तत्वों के प्रकरण में
05:56लिखा है
05:58उस भावनात्मक बंधन को फिर से स्मरन करना पड़ेगा, स्पष्ट रूप से उसको समझना पड़ेगा वो क्या है
06:07और उसके उनरूप गुनवत्ता का वरन हमको करना पड़ेगा अपने जीवन में हमको उसका विवहार करना पड़ेगा
06:16देश के स्वाधीनता के समय जो वातावरण था मुख्याती दीजे ने का कि संग अलग वातावरण था उस वातावरण में
06:31हमको स्वतंड्र करने के लिए प्रयास करने वाले
06:35महापुरुषके और उस समय के समाच को जितनी तपस्या और समर्पन के द्वारा ये सब करना पड़ा उससे कई गुना
06:45अधिक की आवशक्ता आज की परिस्थिती में ये सब करने के लिए हमको पड़ेगी ये परिस्थिती को अम देखतो तो
06:53जान में आता है
06:56वो भाव कौन सा है वो तत्व कौन सा है अपना भारत विविद्धता का देश है अनेक प्रकार की प्राकृतिक
07:09विविद्धता है
07:11अनेक प्रकार की पंथों की प्रांतों की जातियों की भाषा खानपान रितिर्वाज सब प्रकार की विविद्धता है एक होके इस
07:23देश को चलना है जो चलता आया है और आगे भी चलना है तो आधार भूत तत्वा ऐसा चाहिए जो
07:30इन सब को स्विकार करेगा
07:33इन सब को सम्वाल लेगा इन सब की प्रचिष्ठा और सुरक्षा की चिंता करेगा
07:39ऐसा अधार हमारे पास कौन सा है
07:44इतर अतर दुनिया के उपलब्ध विचारों में ऐसा कोई नहीं है
07:50सौभाग्यसे ऐसा विचार परंपरा से हमारी पास है
07:54हमारी सनातन काल से चलती आई जो परंपरा है
07:59और वो केवल परंपरा के नाते नहीं चल रही
08:02उसका जो सत्य है उसकी अनुभूती करने वाले महापुरुस
08:07सतत हमको उपलब्धर रहे है आज भी मिलते है
08:11वो कागज लेखी नहीं है केवल मन की सोची नहीं है
08:16आखन देखी है ऐसी अपनी जो परंपरा है वो हमको बताती है
08:23कि सुरुष्टी में विविधता है बिलकुल स्वाभाविक है
08:26जितनी स्वाभाविक परंतु परिवरतंशील भी है
08:30वो जितनी स्वाभाविक और परिवरतंशील है
08:34उतनी ही संपूर्ण एक अस्थित्व की एकता का सत्य अचल है अटल है और शाश्वत है और मनुष्य को विचार
08:44का वरदान भगवान नी दिया है उसकी परिशुद्धी करते हुए वो अगर अपने में इसको साक्षात कर लेता है और
08:54दुनिया में इसको साक्षात देखता है �
08:57उसके अनुसार जीवन जीता है तो वही करने से शाश्वत और निध्य रहने वाला सुख उसको प्राप्तो होता है जो
09:06मनुष्षता की सनातन खोज है उसी में मनुष्षता आगे बढ़ती है उस सुख की खोज के लिए
09:14और इसलिए उस सुख को प्राप्त करना उस परम सुख को प्राप्त करना ये मनुष्य जीवन का धिये है उसके
09:23लिए जैसा जीवन चाहिए सहीम त्याग पूर्ण वैसा चाहिए उसके लिए जैसा जीवन चाहिए संपूर्ण विश्व को अपना कुटुम्ब मान
09:31कर चलने वा
09:40है इसी सत्य को विविधपंथ से विविधपक्ष से वेदों में हमने गाया था निकट बिठाकर इसी सत्य को उपनिश्दों में
09:51समझाया था मंदिर मत्ध गुरुद्वारे जाकर यहीत ज्यान सत्संग मिलेगा कहीं भी जाओ भारती विचारधारा में आपको यहीत ज्यान य
10:07स्विकार करो सभी को सवरक्षंडो ऐसा हमाना स्वभावय परंपरा से और उसके कारण और एक बात आई है कि विविधता
10:18है वो परिवर्तंशील है इसलिए जीवन में परिवर्तंशील जो होता है वो बदलते समय के साथ बदलना चाहिए शाश्वत बातों
10:28को सदा कायम रखना
10:29चाहिए यह जो लचीलापन है यह लचीलापन भी इसी सनातन दुर्ष्टी का परिणाम है जब हम इस भाव को समझकर
10:39बरतते रहे जब यह भाव हमारे और भी भाव रहते हैं अपने भाशा के प्रती अपने जाती के प्रती अपने
10:47पंत्र संप्रदाय के प्रती स्वाभाव
10:49भाव है लेकिन इन सबसे उपर हमारा यह भावनात्मक एकता का भारत के अपने राष्ट्रियता का भाव जब सर्वोच रहा
10:59तब हम विश्व में सभी दुर्ष्टी से आदर शिदे जब अभी इसको भूल गए तो आपस का नाता भूल गए
11:08अपनापन भूल गए विघटित ह
11:10हो गए उसके कारण दुर्बल हो गए दुर्बल हो गए तो हम भैखा गए हम दरने लगे दुनिया से हम
11:20रहेंगे की नहीं रहेंगे दुर्बल व्यक्ति अपने आपको दीवारों में बन कर लेता है संकुचित कर लेता है वैसा हमने
11:28अपने आपको संकुचित कर लिया क्रू
11:40दुर्बल होने के बाद मनुष्य अपने अस्थित्व को दिखाना चाहता है तो फिर वो कुछ अहंकार भी पाल लेता है
11:48हम अहंकारी भी बन गए और इन सब का परिणाम क्या हुआ हमारी दुर्गती हुई
11:55हमने अचरण को त्याग दिया हमारी दुर्गती हो गए अपने अस्थित्व और अपने अस्मिता को स्मरन करना इस भावनात्मक आधार
12:07को स्मरन करते हुए उसके आधार पर संगति और परस्पर हितके लिए कटिवद्दि जीवन जीना है यह हमको करना ही
12:15पड़ेगा
12:17इसी दुख्टी से सव वर्षों से संग काम करता है और पिछले वर्षों उसकी शताब्दी मनाई गई
12:26शताब्दी के कारिक्रम हुए संग की शाखाओं का विस्तार करना संग का संपर का बढ़ाना ये लक्ष था
12:37इसी निमित्त क्योंकि भारत का स्थान एक बन रहा है विश्व में और संग के बारे में भी विश्वास बढ़ा
12:44है तो विश्व के देशों में भी भारत हिंदू और संग इन तिनों के बारे में सही जानकारी देनी की
12:54आवश्रक्ता ध्यान में आई इस दुरुटी से वहां के
12:57प्रबोधन का भी आयोजन किया गया जो कारेक्रम हुए उसका अब तक का जो प्राब्त वृत्त है अंतिम निश्चित वृत्त
13:07तो हमको मिलेगा कारेकारी मंडल की बैठक में अभी तक जो वृत्त है वो मैं बताता हूँ आगे उसके बढ़कर
13:14और कुछ होगा
13:16संपर का भीयान किया हर गाओं में हर गर में जाने का भारत के चार लाख इकसट हजार पास्तों गरामों
13:26में हम पहुँचे एवं नगरीय जो छेत रहे उसकी हम बस्तिया कहतें 10-10 अजार की एक बस्ती ऐसे वे
13:3541,006 बस्तियों में पहुँचे
13:38दस करोड उन्नीस लाग अठासी हजार पास्सो ग्यारा घरों में हम पहुंचे परिवारों में पहुंचे प्रबुद्धन आगरिक गोष्टिया जिला में
13:50आयोजित करना था
13:511117 जिलों में इसी गोष्टिया आयोजित हुई उसमें महिला पुरुष मिलाकर 4,26,497 प्रबुद्धन आगरिक उपस्थित थी
14:04सभी खंडों में जाती विरादरी के प्रमुखों की सद्भावना बैठके आयोजित करनी थी
14:12पांच हजार 36 खंडों में ब्लॉक्स में वो बैठके संपन्न हुई और वो आगे भी चलेगी अपेच्छा इसी है धीरे
14:22धीरे हर दो तीन महिने मीं ये सद्भावना बैठक खंड के यहीं सब प्रमुख्लों मिलकर करें
14:30हिंदू सम्मेलन हुए मंडलों में करना था 10-20 गाओं का एक मंडल होता है उन्टालीस चोटीस जार 187 मंडलों
14:44में वो संपन्न हुई युवा सम्मेलन भी किये गए जिसमें 49,25,225 युवा उपस्थित रहे जैसा मैंने कहा विश्व
14:57में भारत हिंदू
14:58शंग इसके बारे में सही सत्य जानकारी देने के लिए कुछ कार्यकरताओं के प्रवास बाहर देशों में भी हुए और
15:08वहाँ भी हमारी यह जो सनातन सरस्दभावी भारतीय संस्कृति है हिंदू समाज की सर्व समाविक शक्त है तथा संग के
15:17उद्देश और कार्यकी जान
15:28एक नया कुतुहल जग रहा है भारत की और ध्यान गया है देश का स्थान बढ़ा है देश आगे बढ़
15:38रहा है वैसे भारत के प्रती जिद्नियासा भी बढ़ रही है क्योंकि जड़वाद व्यक्तिवाद और सयम रहित उपभोग पर आधारित
15:47उनका जो जीवन चलता है अध
15:52समस्यां उनके जीवन में उत्पन्न हुई है भौतिक दृष्टी से सरवसंपन्न होने के बाद भी उन समस्यां की चिंता उनके
16:02मन में है उनको यह पता नहीं है कि इतनी बड़ी विधताओं को दुनिया की कैसे समाले एक साथ विकास
16:12और परियावरण को एक साथ कैसे चलाए
16:15कि जो अपने जैसे नहीं है उनसे भी अपने पन से कैसे बरते हैं कुटूंब का जीवन उसमें खषरन हो
16:25रहा है नई पिडी के संस्कारों में खषरन हो रही है
16:29उसको कैसे रोखना आधिसमस्याओं का उत्तर उनके पास नहीं है और इसलिए हम देख रहे हैं कि सब ठीक होने
16:37के बाद भी विश्व में प्राकृतिक तनाव तो बढ़ा ही रहे हैं भूराजनितिक तनाव भी बढ़ रहे हैं आर्थिक अनिश्चित्ता
16:47और पर्यावरणिय सं
16:48कट और वर्चस्व की लड़ाई से विनाश हो रहा है हम देख रहे हैं और दुनिया यह जानती है कि
16:56भारत के पास इसकी उत्तर है और इसलिए भारत अगर बढ़ा हो रहा है तो भारत का कहना क्या है
17:04कि इसको बड़े ध्यान से सुनते हैं हमारे कारेकरताओं के वहां के भा�
17:18देश में तथा विश्वन में सताब्दी के निमित्त प्रारंब ये जो संपर का हमारा हुआ है और ये संवाच शुरू
17:26हुआ है वो सब प्रकार से आगे भी सतत और निरंतर कैसा चले इसकी योजना वराने में कार्यकरता लगे है
17:34पंचपरिवर्तन सर्वदूर मान्या है
17:38क्योंकि जिस परिस्थिती का उपाय वो है वो परिस्थितिया सब लोग अनुभो कर रहे हैं विशेशकर कुटुम्ब प्रबोधन और नागरिक
17:48अनुशासन और परियावरन इसको तो सब लोग तुरंद पकड़ लेती दुनिया भर के विश्व के अन्य देशों में भी इसकी
17:56आवश्यक्ता अनुभो की गई है लेकिन ये वर्षबहर का कारिक्रम नहीं है इसकल्पना से ये नहीं किया गया है स्वहन
18:04सेव को भी ध्यान में रखना चाहिए और नागरिकों को भी समझना चाहिए ये जीवन में आचरण का परिवर्तन लाने
18:12वाली व्योभार की शैली हो
18:14भूल के नाते प्रत्यक्त्यक्षक wal रूती से इसके इसको आदत बननी चाहिए जबह एसी ही बनता न हमाण 100 उन
18:24एइन एक्शाण रीपे रह रीप हो नीचेए जिए कृति करो उसको आदत बनाऊ आधन पढलो उसका समय जाता
18:36तो आदत कुर्ति से और आदतों से स्वभाव बनाने वाले ये सारे कारिया है ये जीवन के सभी आयानों में
18:44हमको सतत आचरित करने होंगे तभी स्थिति में परिवर्तन आएगा हमारे संस्कारों में इस प्रकार का अब्यास है कि छोटी
18:56-छोटी कुर्तियों से हम एक पीड़
19:02की आदते पहुंचाये जाते रहे पहुंचाते रहे उसी प्रकार से इसको अपने आचरन का अपने परिवार के वीति रिवाश का
19:11भाग बना के चलाना पड़ेगा तो फिर इससे समाज में परिवर्तन आएगा और परिवर्तन लाने का आचरन बदले सिवाए दूसरा
19:21कोई �
19:21इलाज नहीं है विवेक्षिल की आचरन की आवश्यक्ता मेरे पूर्व हमारे प्रांत संगचालग जी महानगर संगचालग जी और प्रमुक अथिथियों
19:32ने भी आभी आपके सामने प्रत्वाधित की है पहले ये आचरन परिवार के बड़ोसी मिलता था विद्यालयों के �
19:41पठ्ठक्रमों से मिलता था समाज के वातावरण में भी ये संसकार मिलता था लेकिन ये दिन प्रति दिन कम होते
19:49जा रहा है विद्ञान और तकनिकी की एक तरफ प्रगत्यू हो रही होगी ही और होनी चाहिए भी परन्तु उसके
19:56कारण सब प्रकार की जानकारी समाज माद्�
20:00के द्वारा सब के लिए खुली है जिसको मिल रही है उसमें उसको पचाने का विवेक है की नहीं समझने
20:09का विवेक है की नहीं
20:12बिना विवेक के कैसे होगा शराब बंदी के प्रचार के लिए देहात में गए सरकारी अफसर देहातियों को जमा किया
20:20उनके सामने एक ग्लास में मुठी बर कीड़े डालके उपर से शराब डाल दी वो कीड़े तड़ तड़ मर गए
20:27फिर पूछा कि देखो इससे आप क्या सी
20:30लिख रहे तो एक प्यक्कर था वहां वो खड़ा हो गया उसने का महाराज हम शराब पिएंगे तो हमारे पेट
20:36के किड़े भी ऐसे ही मर जाएंगे क्या बताने चले थे और क्या समझा को विवेक वान के लिए जानकारी
20:45उपकारग हो सकती है विवेक हिन के लिए वह अपकार
20:48प्रक भी हो सकती है लेकिन जानकारी बिना विच्वत अनुचित का विवेक कि ये सब को मिल रही है और
20:57नई पिरितों सीखने वाली होती है जो मिलेगा वो सीखेंगे सब नई बाते उनको आकर्शक रखती है अनुभाव से उसमें
21:05धिरे-धिरे क्या ठीक है नहीं है ये सीख
21:08सकते है लेकिन विवेक पूर्ण सीखना पड़ेगा लेकिन उनको ये जानकारी मिल जाती है और बिना उचित अनुचित के विवेक
21:17के उसके दुष्परिणाम होते है ये अनुभाव करने के बाद इन सब जानकारी देने वाले माध्यों में पर कुछ निर्बंद
21:25कुछ निय
21:26नीती नियम अनुशासन लागु किये गए है अन्य देशों में समाज हमारे देश में चर्चा करता है ऐसे नियम चाहिए
21:34OTT प्लेटफॉर्म्स को वगर लेकर विशेशता तो शासन प्रशासन को इसका भी विचार करना चाहिए
21:43उनको जो करना है वो करेंगे परन्तु हमारे निती नियम हमारे संस्कारों का अगर प्रिष्टन है तो हम लोगों को
21:54अपने नहीं पीड़ी को इस प्रकार कला सिखानी पड़ेगी कैसे चुनना उचित अनुचित कैसे तै करना
22:03उस विवेक के अनुपस्थिति के कारण व्यक्तिगत जीवन में पारिवारिक जीवन में सामाजिक जीवन में कई प्रकार के दोस्परिणाम देखने
22:12को मिलते हैं
22:14ऐसे विवेक के अभाव में ही एक समस्या जो उत्पन हो गई वो नशिली दवाओं की है नशिली दवाएं घातक
22:22होती है यह जानकारी नहीं है ऐसा नहीं है जानकारी है लेकिन फिर भी उसके आदत लगती है और वो
22:30एक गंबिर राष्ट्रिया समस्या बन गई है
22:33समय रहते हुए हमनों को इसका विचार करना पड़ेगा शासंप्रशासन को भी समाज को भी विशेशकर नए अभिभावक पीड़ी को
22:43अभिभावक पीड़ी को यह विवेक नई पीड़ी को देना पड़ेगा और नई पीड़ी को ऐसी बातों से दूर रहने की
22:52अपनी आदत �
22:53बनानी पड़ेगी और इसलिए स्वेंशोकों ने सोचा है कि इस प्रकार की समस्या का प्रतिरोग करने वाले जितने कुछ लोग
23:04भारत में हैं उनके साथ मिलकर कोई इसका एक व्यापक राष्ट्रियों उपाय खड़ा हो सकता है तो उस दिशा में
23:12प्रयास करेंगे
23:14आने वाले समय में अभी हम विश्वगुरु भारत की बात उगरे करते हैं लेकिन इसका मुख्य दाइत्व तो आने वाले
23:22वर्षों में नई पीड़ी के कंदों पर आने वाला है वो हमारी नई पीड़ी तन मन से स्वस्थ हो लक्ष
23:31को पहचाने जीवन की सार्थक्ता को पहच
23:43होना पड़ेगा हमको उसको तैयार करना पड़ेगा क्योंकि विद्ञान और तक्निकी की प्रगति को कोई नहीं रोक सकता वो तो
23:50आता है विद्ञान प्राप्त होता है तक्निकी आती है तक्निकी को रोकना अबेकार है उसके लाब भी है विद्ञान और
24:00तक्निकी की प्रद
24:13प्रागत और स्विकार करना चाहिए परंतु यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि वो केवल साधन है उप्योग करने वाले
24:21पर उसका परिणाम निर्भर है उप्योग करने वाली कि बुद्धी क्या सोचती है कि केवल उपभोग वाद और जड़वात का
24:29दृष्टिकौन लिया
24:30तो क्या होता है हम देख रहे है सुखोसु विधाओं के साथ साथ उससे बड़ी हानी मोल लेनी पड़ती है
24:38उसके कारण मनुष्य निर्मित और प्रकृति निर्मित आपतियां आती है अभी नेपाल में जो भेंकर तराजदी हो गई है अभी
24:50कलकत्ता में भी एक हाथसा हु�
24:55जाता है हमारे बिड़ बड़के पर जाता है दुख्ष तो उसका भी है सबको वहां भी रात पहुचानी के लिए
25:01प्रयास चल रहे हैं लेकिन नेपाल में जो हुआ वह क्यों हुआ
25:06पूरे हिमाचल क्षेत्र में जिन जिन देशों से हिमाचल गुजरता है आज के नक्षों में भारत तिबद भूतान चीन ऐसे
25:16क्षेत्र से वो गुजरता है उसमें जो एकांगी विकास के प्रयास चल रहे हैं उसके चलते हिमाले क्षेत्र में सरवत्र
25:26ये प्रकृती की अस्
25:35होती है दुख सबको होता है हम श्रद्धान जली भी देते हैं रहात के प्रयासों में भी लग जाते और
25:42लगना चाहिए
25:43परन्तु मूल उपायतों विकास की समग्रा और संतुलित दुर्ष्टी का निर्मान करना जो विकास सबको साथ लेकर चले
25:53जो विकास ठाई रूप से चल सके इतना महंगा नहों कि विकास करने वाला ही जीवित न रहे विकास के
26:00चलते हैं ऐसा विकास करने का शास्त्र हम को फिर से सीखना पड़ेगा उस समग्रा और संतुलित दुर्ष्टी जब आती
26:11है तो साधन का योग्य दिशा में उप्योग करन
26:14अनोचित्य उचित्य इसको संयम के संस्कारों की संस्कृति संपूर्ण विश्व को देना चाहती है संपूर्ण विश्व में देखना चाहती है
26:25इसलिए हमारे पुर्वजन उसको साप्रथमा संस्कृति विश्व वारा ऐसा कहा भारत को इस दुर्ष्टी के आधार पर सम�
26:38नया प्रतिमान खड़ा करना पड़ेगा कि आज मानी प्रगति हो रही है लेकिन उस प्रगति के साथ-साथ दुनिया को
26:47एक नया रास्ता देने का दाइत्व भारत का है और इसलिए उस प्रगति
26:52की दिशा, दुनिया में अग्रेसर रहने के और जैसी होगी, वैसे दुनिया को
26:59एक नया प्रतिमान देने की भी होनी चाहिए. इसकी आवश्चक्ता है.
27:04और हमारे रास्टर की चतना वही दुर्ष्टी है. उसी दुर्ष्टी को हम
27:10लोग हिंदू दुरुष्टी के नाम से जानते हैं हिंदू दुरुष्टी में किसी अमुक पूजा की अनिवार्यता नहीं है जाकी रहे
27:20भावना जैसी प्रभु मूरतति न देखी तैसी आपकी पूजा कौन सी है आप पूजा करते हैं कि नहीं करते वो
27:29यह दुरुष्टी प
27:40नाजनीतिक मतवाद, इसके अनिवार्यता भाषा प्रांत नहीं है, यह सबके लिए वास्तों में मानव का धर्म मानवी संस्क्रती है, क्योंकि
27:55इसके इन सबसे उपर लक्षण है, विश्व बंदुत्व, अध्यात्मिकता और मानवता, यही उसके लक्षण है,
28:06अपने अपने प्रांत में, अपने अपने पंथ संप्रदाय में भाषा को बोलते हुए, खानपान रिती रिवाज को करते हुए, जो
28:16लोग इस अध्यात्मिकता विश्व बंदुत्व और मानवता की दृष्टी लेकर चलते हैं, उनके लिए शब्दा आया है हिंदू, हिंद
28:35परंपरा है, इसलिए भा यहने तेज की उपासना में रत भारत, ऐसे भारतीदा की व्यक्या बनी है, इसे को हम
28:47हिंदु भाव कहते हैं, और इसमें शक्ती है पूरे विश्व को जोडने की, बिना किसी को बदले, बिना किसी की
28:55विशिष्ट छोटी पहचान को नष्ट किये,
28:58सुन्दर ढंग से सभी पहचानों को एक सुत्र में पिरो ये, पूरे जगत को साथ ले चलने की क्षमता इस
29:06भाव की है, और भारत के अंदर इस भाव का आचरं किस रूप में देखा जाता है, पहली बात है
29:13भारत माता की भक्ती, सब से उपर भारत, दूसरी बात है, हम सब क
29:21पूर्वत समान है, प्रांत पंत भाचा कुछ भी हो, हमारा मूल एक है, और तब से आज तक इसी सवस्कृति
29:31को जीकर दिखाया है, इस सवस्कृति के रक्षा के लिए खून पसिना भाया है, ऐसे हमारे महापुर्शों के आदर्श है,
29:40उनका गवराव और उनका अनुकरन मन
29:42में रखना, और तीसरी बात है, कि ये जो हमारा स्वभाव है, परंपरा से आया हुआ, व्यक्ति का स्वभाव होता
29:51है, उसी समाज के स्वभाव को संस्कृति कहते है, उस संस्कृति के मूल्य बहुत के अनुसार, आज के समयान उकुल,
30:01स्वयम के जीवन को गड़ते जाना, �
30:04वो दिखने में आधुनिक हो, मूल में उसके वही शाश्वत मूल्य व्यवस्ता हो, ऐसा जीवन गड़ते जाना ये आवश्चक है,
30:14उसी का उधारन देखकर दुनिया को रहत मिलेगी, प्राचिन काल से भारत भूमी पर निवास करने वाला जनसमोयाने, हमारे सब
30:23पुर्व
30:23इसी प्रकार आज तक सब परिष्ठितियों में जीते आये है, उस जीने का आदर्श ही दुनिया के सामने हमको रखना
30:32है, हम सब भारतवासी एक है, और हमारी एकता अंतरिक है, रिदय की है, वो सवदा नहीं है, कॉंट्राक्ट नहीं
30:42है, भारत में हमको ये मिलेगा, तो हम �
30:46नहीं तो हम भारत के नहीं ऐसा नहीं है, वो एकतरपा है, भारत हमको कुछ देगा नहीं देगा, भारत के
30:54लिए हमारा सब कुछ है, मुख्या तीजे ने अपने उद्वोधन में बताया, भारत को हम क्या दे रहेगी सवाल है,
31:01हमारा नाता है, तेरा वैभव अमर रहे मा, हम
31:04दिन चार रहे न रहे हमारा ये तुच्छ दीवन माता की बलीवेदी पर समर्पण हो गया तो वह हमारा सवभाग्य
31:14है
31:14सावर करजी ने कहा था कि हम तीन बंदू समर्पित हो गए तुम्हारे लिए कुण सी विशेश बात है हम
31:22साथ होते तो भी तुम्हारे ही स्थंडिल पर बली जाते इस प्रकार का भक्ती का भाव लेकर बिना शर्त अपने
31:32पन का आत्मियता का संबंद है उसमें रिष्टे नात
31:35का संबंद है उसमें किसी प्रकार की शर्त नहीं होती बिना शर्त इस प्रकार की एक अता यही हमारी स्वाधिनता
31:43से नानियों की प्रिणा रही उसी के चलते उन्होंने अपने जीवन का उत्सर्ग किया अपना पूरा जीवन जनों की हित
31:52में लुटा दिया और इससे जो शक
32:05जगाना जगानार चाहता है जगाएगा इसी को हम हिंदु बाओ कहते हैं है इसी के आधार पर समपूर्ण समाज को
32:15एक सुसंगळ्टित बलसंपन्न समाज हमको बनाना है
32:20बलसंपन्न इसलिए कि कुछ भी करना है तो बल चाहिए आप सास ले रहे ताकत है आप में इसलिए ले
32:26रहे जिस दिन ताकत समाप तो हो जाएगी विंटिलेटर लगाया जाएगा और 24 घंट रहा देखकर आपके सगे संबंदी भी
32:34बताएंगे कि अब निकालो ज़्यादा तक
32:40अलिफ हो जाता है और इसलिए बलसंपन्नता की आवश्यक्ता है व्यक्ति जीवन से विश्व जीवन तक की धारणा प्रतिष्ठा तथा
32:49सुरक्षा भी बिना सामरत्य के संभों नहीं है और इसलिए हिस हिंदु भाव को पुष्ट करते हैं जब हम संगह
32:58के लोग एक संगठ
32:59बलसंपन्न हिंदु समाज की बात करते हैं तो वह बात सर्व पंथ समाधर की भावना और राष्ट्र की एकात्मता के
33:08भावनिक एकात्मता के विरुद्ध बिल्कुल नहीं है हिंदु समाज का विचार और स्वभाव सर्म समावेशक होने के नाते यहां कार्या
33:17हम सब की भा�
33:20वना और सदाचार का पोश्रक तो है ही पीडी दर पीडी यह मिलता रहा संस्कार दुनिया के उपरकारक है इसी
33:30भाव के चलते कैप्टन स्मित वच्छार ने अभी जो किया वो किया वो स्वाभाविक था
33:38एसा होने पर क्या करना इसका ट्रीनिंग नहीं था जो उनकी परंपरा है वो उस कसोती वाले प्रसंद में फुट
33:46पड़ी यह हिंदू स्वाभाव है और इसलिए वो सभी निविधताओं के लिए कोशक ही होगा उनकी प्रतिष्ठा सुरक्षा करने वाला
33:57ही होगा यह कारिया �
34:00देश की एकता और विश्व की एकता के लिए उपकारक कारिया है और यह हम केवल बोलते नहीं ऐसे भाशन
34:10में तो बहुत बाद में सुनते हैं संग में पहले आते हैं और आदत करते हैं आचरन की क्योंकि यह
34:17सारी बाते विचार और वानी की केवल नहीं है आचरन में इस भा
34:23को प्रकट करने की आवश्यक्ता है भारत बहुत बड़ा है सब प्रकार की विविद्धता इसमें है बहुरंगी अपना समाज है
34:33डिखने में अलग-अलग दिखता है लेकिन अंदर से एक है
34:40अपने को इस विविधता में चलना पड़ता है किसी भाषा में किसी पंथ में रिती रिवाजों में रहना पड़ता है
34:46अन्य भाषा पंथर रिती रिवाजों वालों के साथ मिल दूलकर रहना पड़ता है लेकिन अपना ध्यान होना चाहिए इस अंदर
34:55की एकता पर परस्पर �
34:58व्यवहार में मन वचन कर्म में सद्भावना और अपनापन होना चाहिए और दिखना चाहिए
35:07हमारा एक इतियास बीता है उसमें बहुत संगर्श हुए उन संगर्श के कारण मन में घाव पड़े
35:17गाठे भी बनी है और एक दूसरे को देखने से आशंका भी खड़ी हो जाती कि अब यह क्या करेगा
35:23यह ठीक है कि नहीं है
35:26इस प्रकार की गाठी पड़ी है, ये गाठे सुलच जाए, ये संशे दूर हो जाए, नई गाठे न पड़े, नई
35:37शंकाई खड़ी न हो, इस प्रकार का हमारे व्यवार चाहिए, छोटी छोटी बातों पर हमें उकसा कर जगडा करने वाले
35:46ताक लगा के बैठे है, उन से हमको
35:49धूर रहना चाहिए, अपने समाज की विविधता और ये इतिहास देखते है तो, अभी वैसा वातावरन कम मिलता है, बिल्कुल
35:58नहीं मिलता ऐसा नहीं, कम मिलता है, गटनाय होती है, उसके करन असंतोश होता है, आपस में शंकाय वेरभाव उत्पन्नोनी
36:07की संभावना रह
36:16और इसलिए जिनको ये वातावरन चाहिए, इस प्रकार का समाज जो देखना चाहते, उनको बड़े धैरिय पूर्वत अपने विवार को
36:26जैसा चाहिए, वैसा रख कर समाज को समालना पड़ेगा, समाज के लोगों से बरत्ते हुए, हम को चिंता करनी पड़ेगी,
36:36हम सर्व
36:45करने वाले लोगों को समूह को विशेश कर कोई विशिष्टा अभियान उनका चलता है, अत्वा किसी विशिष्टा नीती को समाच
36:53बर लागू करना है, तो अपना व्यवहार भद्र रहे, अपने पनका रहे, नागरिक व्यक्तियों के सन्मा नाधी का लिहाज करने
37:01वाला र
37:12आई है, जो जगड़ा लगाना चाते हो जगड़ा लगाएंगे, लेकिन उनकी कुछने चले, ऐसी घटना ये घटती है तो संग
37:23पर भी उचालते है आरो, जिनको वो संग का विकास प्रगतिसान नहीं होती है, जिनको अपने जेश के एकता के
37:33बारे में कुछ मलाल है, संग क
37:36कोई संबन्द नहीं है, न संग का समर्थन है इसी बातों के, लेकिन संग की सद्भावना ये तुकी प्रामानिक्ता पर
37:43संदेय उत्पन करने के लिए ऐसे प्रष्ण चिन्न लगाते है, संग के कार्य का आधार शुद्ध सात्विक प्रेम है, और
37:54ओ प्रेम किसी एक के लिए
37:55मर्यादित नहीं है, किसी एक समौ के लिए मर्यादित नहीं है, हर हिंदू के लिए है, और हिंदू याने सब
38:03पर प्रेम करने वाला विश्व को अपना कुटू म मानने वाला है,
38:07इसलिए सबके प्रतिशुद्ध सात्विक प्रेम ये संगकारिय का आधार है और संगकारिय चलता है स्वहम से वो कोंके परिश्रम त्याग
38:17सेवा समर्पण से
38:19अपने स्वहम के लिए संग कुछ नहीं चाहता ना लोग का प्रियता चाहता है ना प्रतिष्ठा चाहता है
38:26हम तो काम करते रहेंगे
38:29संगठंग गड़े चलो
38:30सुपन्तपर बढ़े चलो
38:32हो भला समाज का
38:33वो कामसब कीए चलो
38:35ऐसा हम चलते है
38:36एक सत्य लेकर हम चल रहे है
38:39उस सत्य के आधार पर
38:41संपूर्ण समाज को संगटित करने का
38:43हमारा काम
38:44श्रद्धा विश्वास पूर्वक उसको पूरा करने के लिए हम प्रयास करेंगे लक्षपूर्ण होते तक हम कारिकरते रहेंगे
38:52अब इस सारी बाते इस कारिक्रम में इस मंच से आपने पहली भी सुनी है और आप भली भांती इसको
39:01समझते भी है
39:04परंतु फिर भी मैं दोरा रहा हूं क्योंकि आज दोर आपने देखा है जिसका उलेक पहले भी हुआ है एक
39:13पश्चिम से आंधी चली है
39:15जो हर प्रकार की व्यवस्था, हर प्रकार की भद्रता, हर प्रकार का मांगल्य, हर प्रकार की सांस्कूर्तिक और मानिवे सांस्कार
39:24से विरोध रखती है, उसको नश्ट भर्ष्ट उद्वस्ट करना चाहती है, और प्रगत देश भी उससे तत्र है, अभी दो
39:34चार दिनों के �
39:35पहले से जो समाचार आ रहे हैं वो सुन लीजिए फ्रांस में क्या हो रहा है अलबानिया में क्या हो
39:41रहा है बंगलादेश में क्या हुआ नेपाल में क्या हुआ यह सब किरा किया कराया उनका है
39:49मिनिवित्त तो वो कहते है कि रिजाइन चेंज करने से परिस्थिती बदलेगी लिए ऐसा कभी हुआ नहीं है पहले नहीं
39:57हुआ है आज में नहीं हुआ है
40:00अपने स्वार्थता पोशन करने वाले अपने पिठ्ठु सब जग़ प्रभावी रहे इसके लिए ये कार्यवाईया सारे दुनिया में चलती है
40:11और भारत का बड़ा होना ऐसे कारवाई को प्रतिवंद करेगा उसलिए भारत उसका परमलक्ष है वह भारत में भी ऐसे
40:20प्रया�
40:26नीती से भारत चला और उतने ही पक्के नेत्रुत्व ने उसको जिस प्रकार दुड़जा से चलाया उसके चलते और भारत
40:39के नई पीड़ी में खासकर देशा भीबान अपने देश के लिए कुछ करना है अपने देश का कुछ वैश्विक दाइत्व
40:47है इसका भान जगने के
40:49कारण जो समाज का पुर्शार्थ बना उसके कारण और इनके खेल बंद होगे यह आसुरी ताकते जानती है और इसलिए
41:00भारत उनका लक्ष है वो परिशदे करते हैं भारत हिंदू और संगों को किस प्रकार तोडएंगे बिस्मेंटलिंग ऐसा कहते हैं
41:09और उनको सायता भी
41:11मिल जाती है उनिके प्रकृति के कोशलो सर्वत्र है कि शुद्र सत्ता स्वार्थ और विवेक गहिनता के कारण महत्वाकांसी नेता
41:20भी उनको मिल जाते हैं अब समाज बहुत बड़ा है देश अपना अभी विकास कर रहा है पूरा नहीं हुआ
41:28तो समस्य रहेगी समस्य रहत
41:31की है और समस्या के चलते आंदोलन भी होते ही है और प्रजात अंतर में अंदोलन होंगे ही परन्तु आंदोलन
41:41किसलिए होने चाहिए समाधान के लिए होने चाहिए
41:47अंदोलन का उद्देश समाधान है तो अंदोलन करने वाला पोई समू हो या सांती सुव्यवस्था कायम करने के लिए कारिवाई
41:58करने वाला शाषन प्रशाषन या राजनीतिक नेतागण हो
42:01अपने एक अखंड समाज में हमारी करनी के कारण किसी प्रकार की अनबन द्वेश त्वेश मलाद या विबाजन पैदा नहीं
42:10होना चाहिए
42:12भावना एक कितनी भी तीव रहो हमारे सम्विधान काविन की मर्यादा बोल चाल चलन के भद्र विवार के संकेतों की
42:21मर्यादा अन्दोलन से समस्या का समाधान होगा ऐसा बहुत कम है
42:28अंदोलन नहीं समाज के उद्यम से समाज होता है समादन होता है इसके बहुत उदारण है अभी मैंने पूछा था
42:36कारेकरताओं को
42:38कि समाज की सक्रियता और आपसी समवात के आधार पर कुछ विद्यालेयों का भला हम कर सकते क्या गरामिन विद्यालेय,
42:46सरकारी विद्यालेय, चलते नहीं
42:49तो जो काम हुआ उसका अनुभव बहुत उत्सावर्दक है
42:5321 फ्रांतों के 210 जिलों में हमारे स्वेंचोकों ने गाव वालों को या उस बस्ती के कार्कुशन स्कूल में बस्ती
43:01वालों को एकत्र करके कुछ प्रयास किये
43:05तो 1296 विद्यालेय में ऐसा अनुभव आया कि जहां ग्राम वासियों का सहवाक और स्वेंचोकों का साथ रहा
43:13वहाँ चात्रों की उपस्थिती सीखने का स्थर और अभिभावों को की स्कूल चलाने में सहवागेटा का सुधा हुआ है
43:22शिक्षा सहायता और आधारबुद्थ सुवितात की चिंता तो समाजने की ही
43:27साथ साथ खेल सांस्कूर्टिक गतिविदिया और मूल्य आधारिक गतिविदिया बड़े स्कूल में इसका भी उन्होंने प्रयास किया
43:36ग्रामवासियों के सम्मिलित प्रयासों के आधार पर गावों का समगर युकास करने के प्रयास तो हज्जारों ग्रामों में चल रहे
43:44है और सेकडों ग्राम दिखाने लायक हो गए है ये पूरा का पूरा समाज के आधार पर हुआ है
43:51अपने देशबंदूओं में स्वाभिमान स्वावलम्मन तथा राष्ट्र के जीवन में सहयोग सहबात की भावना बलवती बने तथा उसे चरिता अर्थ
44:01करने की शक्ति और शमता उन्हें प्राप्तों इस प्रकार की सेवा लाखों प्रकल्पों में स्वहिंसेवक कर रहे हैं
44:09क्योंकि उनकी भावना है समाज और देश को केवल नेता लोग नहीं चलाते केवल शासन प्रशासन नहीं चलाता वास्तों में
44:19समाज देश को चलाता है और समाज में हम भी है तो समाज और देश को चलाने की जिम्मेवारी हमारी
44:26भी है क्योंकि ये देश और समाज मेरा अपन
44:31प्रेपन की प्रिर्णा अगर अंदोलंग के पीछे तो सब ठीक होता है लेकिन अंदोलंग किसी दूसरे लक्ष से चले तो
44:39वो राजनीती का साधन बन जाता है किसी व्यक्ति समुय विचार के प्रती विरोध भढ़काने का काम करता है शत्रुभा
44:47भढ़काता है
44:49और इसका लाभ भारत को दबाने वाली शक्तिया भारत में लेती है मतभेदों को और गहरा बनाकर मनभेद उत्पन्न करना
44:59समस्षाओं के परिप्रेक्ष में अन्याइक रस्तता की भावना बनाकर विक्तिम हुड की भावना बनाकर उसके आधार पर समास से काटकर
45:10एक अलग व
45:15समस्षाओं करना कला भड़काना उग्र असंतोष को भड़काना अव्यवस्था और अराजक्ता वातावरन बनाना यह उनकी कार्यपद्दती है पहले भी चली
45:26है आज भी सरवत्र चली है यह प्रत्यक्ष ऑर भारत को जिनको दबाना ऐसी विश्व में भी शक्तिया है वि�
45:56उनके बड़ापन को धक्का लगेगा और इसलिए वो भी अपना खेल इसमें करती रहती है
46:05गाठुनिया भोलया जीवा अंधारात घाली लगावा भोले भाले लोगों को पकड़ कर भेदभाव बड़ाते हुए दुष्टता अंधेरे में से आगात
46:14कर रही है
46:15और इसलिए आगी की पंक्ती में कहा जाता है चित्त नित्य सावधत हेवा एक लक्षी लाओन डोड़े
46:35परसपर सद्भावना के रक्षा करनी है सावधान रहकर किसी प्रकार से उद्वेलित उत्तेजित न होते हुए अपनी आकांग्षा भारत को
46:44विश्वगुरुपत पर देखने की वह अपना पवित्र लक्षन नित्य ध्यान में रखते हुए हमको सतत प्रयास करने पड़ें
46:53आत्मियता अनुशासन तथा अपने राष्ट्रिय धे के प्रती निष्ठा पर जो समाज टिका है वह समाज ही एकता को पाता
47:02है और अपराज यह शक्ति को भी पाता है यह संग की प्रतिती है कि अपने समाज ने प्राचिन काल
47:09में अस्तित्व का की एकता के सत्य को साक्षात
47:13किया उसके आधार पर विश्व को उस अनुभित्वी का समय समय पर प्रदान किया और सभी का स्विकार संबान प्रतिष्ठा
47:23करने वाले बहुरूप परंतु एकरस जीवन को परंपरा से अभी तक हमारा समाज जीता आया है उन एकता के सुत्रों
47:33पर हमको दुरूर रहना चाहि
47:40लाड करजन ने अंगरेजों का राश था तब बंगाल का विबाजन किया हिंदू-मुसल्मान के आधार पर समाज को तोड़ने
47:49के लिए
47:52परंतु यह एकता का मूलमंत्र प्रणावी था तुरंत समाज जग गया उसी एकता के वातावरण में वंदे मातरम आया और
48:03वो अपने स्वतन्द्रता की प्रेणा बनकर सारे देश पर छा गया
48:08इतना विरोध हुआ कि ब्रिटिश सरकार को चार साल के बात उस विभाजन को वापस लेना पड़ा विभाजन परास्त हो
48:18गया उन्नीस सो साहतालिस में ऐसा नहीं हुआ क्यों नहीं हुआ क्योंकि हम इस चपेट में आ गए कि हम
48:27दिखते अलग है इसलिए हम अलग ही है
48:33सामप्रदाइक कट्रपंथी मरू उर्त्ती आ गई हमें बाटकर लडाने के लिए इंग्रज बैठाई था
48:39अलगाओ राजनीतिक वर्चस्व की लालच तथा स्वार्थ सिद्धी के संयुक्त जुनून में हम हमें एक बनाकर रखने वाले आधारों को
48:49वंद्यमातरम सहित क्रमशाह नकारते गए
48:53तुष्टी करण की मानसिक्ता के कारण हमें तोड़ने वाली इस मानसिक्ता को और हवा मिली देश विभाजन तक हो गया
49:02और जिस शान्ती और अलग स्वायत पर अस्थित्व के सुख की आशा देखकर ये सारा किया गया वो तो मिला
49:11नहीं दुष्टता का विभाजनकारी खे
49:16कीमा पर और देश में सदा के लिए अशांती परस पर अविश्वास असुरक्षा और छोटे छोटे कारणों से कल यह
49:24परिस्थिती अखंडगे भारत के पूरुव अंग जो थे उन सब में आज भी विद्यमान है क्योंकि हम अलग नहीं है
49:33हम अपने एकता के आधार को बूल ग
49:38संग के विभाजनकारी शडियंत्र को परास्त करने वाला वंदे मातरम आज भी वह प्रेणा देने के लिए सशक्त है इकता
49:47की वह अपना राटरगेत है उसे स्वाभिमान से उच्चकंठ से और संपूर्ण गाने में कोई संकोच या विरोध होना नहीं
49:57चाहिए भारत की मात
50:04भूमिके नाते भरति हमारे समान भारतिय पुरोजो के जीवन का गौरोव और अनुकरन्ट और सनातन भारतिय वैश्विक सांस्कुर्टी के वैश्विक
50:12मानवी υमूल्यों के अनुसार अपने जीवन को ढालना यह हम सब को सदा एक रखने वाला काम है सभी पंथाप्रांत
50:21�
50:21भाशा जाती आधी विविधताओं का अरो अविरोधी ऐसा ये आधार है इसके नित्य परिशिलन से इसको समझना मन से अपनाना
50:31हमारी एकता के साथ हम प्रत्यक की विशिष्टता को भी पुष्ट करते रहेगा अपनी छोटी पहचान पर खत्रे की जूटी
50:40आशंका मन में ले
50:43कर अत्वा उसके अंकार में भ्रहमित होकर हमारी एकता के इन आधरों को छोड़कर बार बार वही ठोकर खाने की
50:51गलती हमें नहीं करनी चाहिए
50:54अपने छोटे अंकार को भूल जाएए अपने स्वयम की तथा अंज लोगों की उपासनाओं के बादे में पाले हुए भ्रहम
51:02को विविज़ता को अलगाओं मानने की प्रवृत्ति को हमें त्यागना ही पड़ेगा भारत भत्ति पूर्वज गवरो भारतिय संस्कुर्ति के
51:12हम सब जोडने वाला हमको सब को जोडने वाला यह त्रिशूत्र है उसको मन से अपनाना और देश के लिए
51:19जिना यह हमारा करता भी है क्योंकि हमारा एक वैश्वीक दाई तो अभी है जिन समस्याओं के कारणा आज विश्वत
51:27तरस्ता हुए हम आतंकी तह हैं उनके मुल में
51:31उनका जो अधुर्वी दृष्टी को नहीं वो है पुर्शार्थक में में उनसे भी हमको बहुत कुछ सीखना है वो देश
51:40अधुर्वी दृष्टी वाले इसका मतलब गये बीते नहीं है उनसे भी लेने लायक बहुत बाते है संगटन की कला उनसे
51:46ले सकते हैं हम लोग परंत�
51:48उनके अधुर्यपन को पूरा करना अपना दाइत्वय इश्वर प्रदत्त करतव्य है और इसलिए अपनी राष्ट्रियता का स्वस्थ और स्पष्ट स्वरूप
51:59समझते हुए हम संगटित पुर्शार्थ में जुट जाएं अपनी एकता और गुणवत्ता को संजो कर इसकी
52:10जोडने वाला सबको ऊपर एक साथ उठाने वाला जो तत्व है उस दुरुष्टी से संदुलन की शिक्षा देने वाला उस
52:17दुरुष्टी से अनुशासन देने वाला जो तत्व है उसी को हम धर्म कहते हैं उस धर्म तत्व के से विकास
52:25के पत को सरवांग परिपूर्ण बन
52:40जिसमें भौतिक विकास और नईतिक अध्यात्मिक विकास भी होगा और इसलिए हमको जीवन जीना चाहिए यह ध्यान में रखते हुए
52:49हम जो करेंगे जीवन में छोटे से छोटा यहां बैठे हो आप गीद गाएंगे आप शारीरिक करेंगे आप अपने ओफिस
52:58में काम करें�
53:06परिशन का काम है लेक्ट करना ही पड़ेगा अगर दुनिया के सामने आदर शरक ना एं तो यह होना ही
53:12पड़ेगा और अपने से प्रारंबा करना पड़ेगा समाज में देश के समाज के सुरक्षा एकात्मता सामाजिक नियाए एवं प्रगति-प्रतिश्ठा
53:24के लिए जो �
53:25वही करूँगा जो बाधक है उस से मेरा फाइदा क्या है मैं विचारूंगा उसको त्याक दूँगा
53:33जो क्योंकि भारत का परमववर विश्व गुरुदकों भगवान वर्दान में देने वाला नहीं है को पौई हम पर उपकार करके
53:40भीकृचेने वाला नहीं है
53:43यह पुर्शार्त हम में से प्रत्यक को करना पड़ेगा पूरा समाज इस प्रकार सोचेगा तब वो आएगा और इसलिए इसका
53:54दुसरा कोई शॉर्टकट नहीं है दुसरा परियाई नहीं दुनिया में जब कोई देश बड़ा हुआ है उसके पूरे समाज ने
54:00प्रयास किया है
54:01वो हमको करना पड़ेगा और अपने व्यक्तिगत पारिवारिक सामाजिक तथा व्यावसाइक जिवन व्योहर में नित्य छोटी छोटी सत्कृतियों के द्वारा
54:12परिवरतन लाते हुए सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी अपने कर्तव्यका पालं करे कर सके इस प्रकार का व
54:30इस सेवा और भक्ति की पर रहा पर कदम बढ़ाती है और ये कदम बढ़ें ऐसा करने के लिए ही
54:39प्राष्ट्रिया स्वेंसेवक संग का कार्य है और इसलिए अपने शत्वार्शिक्षी के कारिक्रम और लक्षों को पूर्ण करने के पश्चात समाज
54:48की ऐसी संगठित पुरु
55:00के हित हो समर्पित जन्मापना तुष्टमा होगी तभी तो विश्व में सम्मान पाकर बढ़ रहे चरणा गिज्ञत बस इसी धुनमें
55:10निरंतर देय के पथपर निरंतर देय के पथपर निरंतर बारत माता की जाए