00:00हजरत उमर वेंडा और भू के बचे, एक रात हजरत उमर फरुक वेया, मदिना की गलियों में लोगों का हाल
00:06जानने के लिए निकले, आप अरे, अकसार रात के वक्त शेहर का चक्कर लगाते थे, ताके अगर कोई जरूरत मंद
00:12हो तो उसकी मदद कर सकें, चलते चलते आप आर
00:16ने एक छोते से घर से बचों के रोने की आवाज सुनी, आप रुक गए और देखा कि एक माचुले
00:21पर देख्ची रखे बैथी है, बचाई भुक की वज़ा से रो रहे थे, हजरत उमर रवय ने पूचा बचाई क्यों
00:27रो रहे हैं, मा ने कहा घर में खाने को कुछ नहीं, म
00:45आपके साथी ने का, अमीर अलमुमिनीन, ये बच मुझे दे दी, हजरत उमर आई रेशों ने फरमाया, क्या कायमत के
00:51दिन मेरा बच भी तुम उताओगे, फिर आप खुद वो समान लेकर उस घर तक गए, खाना तयर करवाया और
00:57अपनी आन्खों के सामने बचों को खाना ख
00:59खिलाया, जब बचों के चेहरों पर मुस्कुराहत आए, हजरत उमर आई भी खुश हुए, इस वकिये से हमें सबक मिलता
01:06है कि जिम्मदारी सिर्फ हुकूमत करना नहीं, बलकि जरूरत मंदों का ख्याल रखना भी है
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