00:00।
00:53।
01:04।
01:05।
01:05।
01:06।
01:06।
01:06।
01:09।
01:10।
01:15।
01:16ुश दिर बाद संत ने कहा रुको अब बताओ रास्ते में कितने लोग मिले आरव बोला महराज मुझे कुछ पता
01:27नहीं मैं तो बस मठकी बचाने पर ध्यान दे रहा था
01:30संत ने शांत स्वर में कहा यही संत होने की शुरुवात है जब ध्यान जरूरी चीद पर होता है तो
01:37बेकार की आवाजे अपने आप चुप हो जाती है तुमारी चिंता इसलिए है क्योंकि तुम उन्ची जो पर ध्यान दे
01:43रहे हो जो अभी हुई ही नहीं फिर संत ने आगे कह
01:47जो तुमारे हाथ में है कर्म उसे इमानदारी से करो जो तुमारे हाथ में नहीं भविश्य उसे भगवान पर छोड़
01:54दो यही संत का मन है उस दिन आरव समझ गया संत होना जंगल में जाना नहीं है संत होना
02:02मन की अनावश्यक चिंताओं को छोड़ देना है धीरे धीरे आर
02:06and he has got a chance to do this, and he has got a chance to do this, and he
02:13has got a chance to do this.
Comments