00:00ग्लेशियर पिखल रहे हैं, जीलें फट रही हैं, नदियां उजाड रही हैं, और दुनिया भर के विशेशग्य समाधान बता रहे
00:09हैं, सोलर लगाओ, इलेक्ट्रिक चलाओ, पेड लगाओ, सम्मेलन करो, 50 साल से यही चल रहा है, सम्मेलन, दर सम्मेलन, और
00:18उत्सरजन हर द�
00:21प्रशन बनता है, कहीं हम बीमारी की जगे बुखार का इलाज तो नहीं कर रहे हैं, देखिए, जलवायू संकट को
00:27आम तोर पर तकनीकी समस्या माना जाता है, कारबन ज्यादा है, कम कर दो, पर पूछिए, कारबन आया कहां से,
00:36खपत से, और खपत आई कहां से, यहां रुक
00:51का हमने चुना है, वो है, चीजें, एक और गाड़ी, एक और मकान, एक और यात्र, एक और अपग्रेड, पर
01:00इस तरकीब में एक गडबढ है, खरीद कर देख लीजे, खालीपन भरता नहीं, सिर्फ कुछ देर के लिए ढखता है,
01:07तो फिर अगली चीज चाहिए, फिर अगल
01:21तक्नीक अकेली क्यों नहीं बचा पाएगी, क्योंकि तक्नीक खपत को कुशल बनाती है, खत्म नहीं करती, इंजन बहतर हुए, गाड़ियां
01:29चोगुनी हो गई, बल्ब सस्ते हुए, रोशनी की भूख बढ़ गई, जब तक भीतर का कुवा प्यासा है, बाहर की
01:37हर बचत न
01:49प्रित्वी की बीमारी हमारी सेहत का सबूत बन गई, तो संकट कारवन का नहीं है, संकट उस मान्यता का है
01:57कि मैं शरीर हूँ, और शरीर का भोग बढ़ाना ही जीवन है, जब तक ये मान्यता है, तब तक आदमी
02:04प्रित्वी को खाता रहेगा, सोलर पैनल के नीचे बैठ कर �
02:08इसलिए कहा जाता है जलवायु संकट चेतना का संकट है, और चेतना का इलाज बाजार में नहीं मिलता, वो �
02:17आत्म अवलोकन से आता है, जिसने अपने मन को देखा, उसने अपनी खपत को देखा, जिसने जान लिया कि खालीपन
02:24चीजों से नहीं, बोध से भरता है, उसकी मा
02:37प्रित्वी की सबसे बड़ी सेवा है आत्मग्यान ही अंतिम पर्यावरण रक्षा है प्रित्वी को बचाना है तो पहले उसे जानिये
02:47जो प्रित्वी को खा रहा है
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