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ऑटो-टॅक्सी चालकांना मराठी शिकण्यासाठी कोणतीही अंतिम मुदत ठेवू नये, अशी मागणी संजय निरुपम यांनी केली. गेल्या तीन-साडेतीन महिन्यांत सुमारे 85 टक्के गैरमराठी चालकांनी कामचलाऊ मराठी शिकून प्रमाणपत्र मिळवल्याचा दावा त्यांनी केला. उर्वरित 10-15 टक्के चालकांवर दंडात्मक कारवाई करण्याऐवजी मराठी शिकवणारी केंद्रे वाढवावीत, असेही त्यांनी म्हटले. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यांनी आवश्यकतेनुसार मुदत वाढवण्याची घोषणा केल्याबद्दल त्यांनी समाधान व्यक्त केले.

राहुल गांधी यांनी आदिवासी विद्यार्थ्यांच्या प्रश्नांवर मुख्यमंत्र्यांना लिहिलेल्या पत्रावरही निरुपम यांनी प्रतिक्रिया दिली. महायुती सरकार आदिवासी विद्यार्थ्यांच्या वसतिगृहातील समस्या सोडवण्यास सक्षम असून आवश्यक सुविधा उपलब्ध करून देईल, असे ते म्हणाले.

हिजाबबाबत अलाहाबाद उच्च न्यायालयाच्या टिप्पणीचे निरुपम यांनी स्वागत केले. धार्मिक परंपरांचे पालन घर किंवा धार्मिक स्थळी व्हावे; शाळा, महाविद्यालये आणि सार्वजनिक ठिकाणी सार्वजनिक व्यवस्थेला प्राधान्य दिले पाहिजे, असे मत त्यांनी व्यक्त केले.

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Transcript
00:00एक मेने का प्रारंब से कह रहे हैं कि किसी प्रकार की कोई डेडलाइन मत रखिये और जो हमारे मुंबई
00:15में या MMR रिजन में जो गैर मराथी भासी जो आटो चालक या टैक्सी चालक हैं उनको निश्ची तोर पर
00:24मराथी आने चाहिए मराथी सीखने के लिए जो अलगलग कें
00:28रहे हैं वो अनवरत जारी रखिये मुझे बड़ी खुशी होती है कि पिछले तीन साड़े तीन महीने में लगबग 85
00:36% ऐसे आटो ड्राइबर टैक्सी ड्राइवर्स ने मराथी काम चलाओ मराथी भासा का ग्यान अरजित कर लिया उनके पास प्रमाणा
00:43पंतर भी मिल गया अ
00:46उनके उपर जो एक डेडलाइन और उनके खिलाब जो एक्शन लिया जा रहा है उनके खिलाब जो दंडात्मक कारवाई की
00:52जा रही है वो गलत है और इसी भी सह पर कल मैं मंत्री जी से भी मिला और मुझे
00:56बड़ी खुशी हो रही है कि साम होते होते माननी है मुख मंत्री ने
01:16इन परिश्टितियों को देखते हुए किसी प्रकार की कोई डेडलाइन रखी जाए और जादा से जादा केंदर बढ़ाये जाए
01:24राहूल गांदी जी को इतना तकलीप उठाने की जरूरत नहीं है इसलिए कि हमारे यहाँ जो सरकार है
01:41महरास्ट के हर वर्ग के जो लोग हैं जो चाहे नौजवान हों या महिलाएं हो या बुजर्ग हों या किसान
01:49हो या मजदूर हों
01:50उन सब के दुख दर्द उन सब की जो पीड़ा है उसकी चिंता करने के लिए परियाप है और वो
01:55सक्षम है
01:56तो अगर हमारे आदिवासी समाज के आदिवासी बच्चों के होस्टल में किसी परकार की कोई कमी है तकलीफ है तो
02:03निश्ची तो पर सरकार उस पर एक्षन देगी और आदिवासी बच्चों को सारे सुविदाएं उपलब्त करा के देगी
02:17सबी धर्मिया मजहब की अपनी परंपराएं होती है और उनके अपने कुछ नॉम्स होते हैं और उसका पालन करने के
02:27लिए वो बहुत जिद्ध करते हैं बहुत आगरह करते हैं
02:30लेकिन जो धर्मिक परंपराएं होती हैं वो अपने मंदीर में अपने घर में पालन किया जाना चाहिए सारवजनिक स्थलोपे नहीं
02:40स्कूल में कॉलेज में या फिर पब्लिक प्लेसेस पे कोई धर्म विशेस के लोग बोलेंगे कि हमको ये खास तरह
02:48की परंपरा का पालन करना है
02:49वो कहीं ने कहीं जो एक सारवजनिक बिवस्था होती है जिसको हम पब्लिक और बोलते हैं उसके खिलाब जाता है
02:56तो इलाबाद हाई कोट का ये फैसला स्वागत योग्य है और मुझे लगता है मुस्लिम समाज के लोगों को इस
03:03फैसले का मर्म समझना चाहिए और देश के मुक्यधारा में आना चाहिए
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