00:00वन्दे मातरम
00:01ये सिर्फ दो शब्द नहीं है
00:03बलकि भारत के स्वतंदरता आंदोलन की सबसे टाकतवर आवाजों में से एक है
00:08यही वो गीत था जिसे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन में नारे की तरह इस्तमाल किया गया
00:13और जिसने हजारों सोतंदरता सेनानियों में दिशभक्ती का जजबा जगाया
00:19लेकिन आज करीब डेड़ सदी बार यही गीत एक बार फिर राजनुतिक बहस के किंदर में है
00:24सवाल है क्या कॉंग्रिस ने 1937 में वन्दे मातरम को तोड़ दिया था
00:30क्या यह फैसला मुस्लिम लीग के दबाब में लिया गया था
00:32या फिर उस समय के नेताओं ने राश्ट्रिय एकता और सभी समुदायों की स्विकार्यता को ज्यान में रखते हुए
00:38एक वेभारिक फैसला लिया था
00:41तो चलिए आज के इस स्पेशल रिपोर्ट में हम जानेंगे कि वन्दे मातरम की शुरुआत कहां से हुई
00:46विवाद शुरू कैसे हुआ
00:481937 में कॉंग्रस ने क्या किया था
00:50पिर 1950 में क्या बवाल हुआ था
00:53और अब 2026 में ये विवाद क्यों लोटा है
01:06तो इस पूरी कहाने को समझने के लिए हमें बापस 19 सदी में जाना होगा
01:11सबसे पहले ये जानना होगा कि वन्दे मातरम की शुरुआत कहां से
01:15वन्दे मातरम की रचईता थे बंगाल के महान सहित्यकार बंकिम चंद्र चटुपाध्यार
01:20कुपलब एतिहासिक सोर्स के अनुसार इसकी रचना 1870 के दर्शक में हुई थी
01:25और इसे 7 निवेंबर 1875 को सहित्यक पत्र का बग दर्शन में प्रकाशित किया गया
01:31बाद में बंकिम चंद्र ने इसे अपने प्रसिद उपन्यास आनंद मठ में शामिल किया
01:36लेकिन उस समय ये सर्फ एक सहित्यक रचना थी
01:39इसका राजनितिक जीवन में बाद में ये इसकी शुरुआत हुई
01:441896 में कलकत्ता में हुए कॉंगर्स अधिवेशन में रविंदरनाथ टैगोर ने वंदे मातरम गाया
01:49इसके बाद ये गीत राश्ट्री आंदोलन में तेजी से लोगप्रया होने लगा
01:531905 में जब अंगरेजों ने बंगाल का विभाजन किया
01:58तब वंदे मातरम आंदोलन का एक महत्वपुर्ण और प्रमुख प्रतीक बन गया
02:03बिटिश शाष्टन के खलाफ प्रद्वशन करने वाले लोग इसे गाते और इसके नारी लगाते थे
02:09यानि वंदे मातरम का राजनितिक महत्वप सिर्फ बाद के वर्शों में नहीं
02:26और दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसे धार्मिक संदर्भों लाए गए लाते हैं
02:30यही से समझतिया शुरू हुई
02:321930 के दशक में मुस्लिम लीग और कुछ मुस्लिम नेताओं ने आपत्ती जताई कि
02:38ऐसे धार्मिक संदर्भों वाला गीत सभी भारतियों के लिए राष्ट्य गीत के रूप में स्विकार करना कठिन हो सकता है
02:45यहां एक बात समझना जरूरी है
02:47वंदे मातरम की आलोचना सिर्फ गीत के पहले दो अंतरों को लेकर नहीं थी
02:52विवाद मुखे रूप से बाद के अंतरों और उनके धार्मिक संदर्भों से जुड़ा था
02:57और 1937 आते आते यह सवाल कॉंग्रेस के सामने भी गंबीर्दा से खड़ा हो गया
03:03तो 1937 में कॉंग्रेस ने क्या किया
03:05अक्चुबर 1937 में कॉंग्रेस वरकिंग कमिटी की बैठक कलकता में
03:10इस दौर में महात्मा गांधी, जवाहर लाल लहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, मौलाना, अबूल, कलाग, आजाद और दूसरे बड़े
03:18निता कॉंग्रेस के शिर्ष नित्रतों में थे
03:35इस सवाल पर रविंद्रनाथ टैगोर की राय व्यद महत्मूर बनी, टैगोर खुद 1996 के कॉंग्रेस अधिवेशन में वंदे मात्रम गाच
03:43चुके थे, 1937 में उन्होंने इस विवाद पर अपनी राय देते हुए कहा, कि मूल कविता के संदर्मों को देखते
03:49हुए, पूरी �
04:02टैगोर का तर्था, पहले दो अंतरों को राश्ट्रिय गीत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, जिबकि बाकी रचना
04:10अपने साहितिक संदर्म में बनी रह सकती है, फिर आता है 28 अक्टूबर 1937 का पैसला, जो है इसके बात
04:1728 अक्टूबर 1937 को कॉंग्रेस वर्किंग
04:20कमेटी ने वंदे मातरम को लेकर एक महत्वपुन बयान जारी किया, इसमें कहा गया कि राश्ट्रिया सभाव में वंदे मातरम
04:26गाते समय किवल पहले दो अंतरे गाये जाएं, साथी आयो जकों को किसी अन्य ऐसी गीत को गाने की सुतंतरता
04:33भी दी गई, जिस पर किसी को धा
04:35किया अन्याधार पर आपती ना हो, अब इन पहले दो अंतरों की खासियत समझे, इन में भारत की प्रकृती और
04:42मातरी भूमी का वर्णन है, सुजलाम, सुफलाम, मलययज़, शितलाम, यानि कि ऐसी धरती जो जल से भरपूर है, फल पूल
04:50से समर्द है, और जिसकी हवाओं मे
04:52शीतलता है, इन दो अंतरों के बाद के हिस्सों की तरहे देवी देवताओं के सुपष्ट धार में के संदर नहीं
04:58आते, इसलिए कॉंगरिस के उस समय के तर्ग के मुताबिक यही हिस्सा राष्ट्रिय मंच के लिए अधिक व्यापक रूप से
05:04स्विकारत था, क्या ये फैसल
05:18में वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर चर्चा में प्रधान मंत्री ने 1937 के फैसले पुले कर आरूप
05:24लगाया कि कॉंगरिस ने मुस्लिम लीग के दबाब में गीत के साथ समझोता किया और बाद में यही सोच देश
05:30के विभाजन तक पहुंची, लेकिन कॉंगरिस और
06:02उसके नेताओं की वियाख्या अलग है।
06:03बड़ा सवाल साब में था, क्या ऐसा गी चुना जाए जो एतिहासिक रूप से शक्तिशाली हो लेकिन जिसके कुछ हिस
06:10समुदाय को धार्वी कुरूप से असहेच करते हैं।
06:131937 का फैसला इसी समस्या का राजुनतिक समधान था।
06:17तो फिर 1950 में क्या हुआ?
06:19अब आज बहुत से लोग एक सवाल पूछते हैं, अगर वंदे मातरम को लेकर इतना विवाद था, तो सुतंत्र भारत
06:25ने इसे क्या दरजा दिया?
06:2724 जन्वरी 1950 को सम्मिधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर राजीत्र प्रसाद ने गोशना की कि जन गणमन को राष्टियगान और
06:37वंदे मातरम को राष्टियगीत के रूप में सम्मान दिया जाएगा और दोनों को समान सम्मान का दर्जा प्राप्त होगा।
06:44इस तरह स्वतंत्र भारत ने दोनों को अलग-अलग लेकिन महत्वपुण सम्मेधानिक राष्टियग परंपरा में स्थान दिया।
06:51एक तरफ जन गणमन नैशनल अंथम। दूसरी तरफ वंदे मातरम नैशनल सौंग।
06:58और यही सिती आज भी है। पर 2026 में ये विवाद क्यों लोटा।
07:03वंदे मातरम के देर सोवर्ष पूरे होने पर 2026 में देश भर में उशेश कारेक्रम लिया।
07:09संसद में भी इस पर व्यापक चर्चा हुई।
07:12धानमंत्री मोदी ने इसे सोतंतरता अंदोलन की प्रेणा और राष्ट्रिय एकता के प्रतीक की रूप में प्रस्तूत किया।
07:17लेकिन अगस्ट 2016 में विवाद ने नयराजने तिक मोड लिया।
07:21कॉंग्रेस वरकिंग कमेटी ने 19 अगस्ट को फैसला किया कि पार्टी के कारेक्रमों में बंदे मातरम के पहले दो अंतरे
07:28ही गाने की परबपरा जारी रहेगी।
07:30इसके बाद बीजेपी ने 22 अगस्ट को प्रस्ताव पारिद कर कॉंग्रेस के इस रुख की आलोच ना की और कहा
07:35कि राष्ट्य गीत के सम्मान और उसकी पूरी एतिहासिक विरास्त से समझोता नहीं किया जा सकता।
07:41यानि 1937 का फैसला जो उस समय राष्ट्य आंदोलन की एक राजुनितिक और सामाजिक समस्या का समधान था, आज फिर
07:48कॉंग्रेस बनाम वीजेपी की वेचारिक बहस का हिस्सा बन गया है।
07:52तो आकिर 1937 की कहानी हमें क्या वदाती है। बंदे मातरम का इतिहास सर्फ एक गीत का इतिहास नहीं है।
07:59ये उस दौर की कहानी है जब भारत अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहा था।
08:02और साथ ही ये तैय करने की कोशिश भी कर रहा था कि आजाद भारत की राष्ट्य पहचान क्या सी
08:08होगी। एक तरफ बंदे मातरम की एतिहासिक भूमिका थी। इसने स्वतंतरता आंदोलन में लोगों को जोड़ा और बिटिस शासन के
08:16खिलाफ प्रतिरोध की आवाज बना�
08:21प्रति थी।
08:22उन्स सेटिस में कॉंग्रस ने पहले दो अंतरों को राष्ट्य सभाव के लिए चुनकर एक ऐसा रास्ता अपनाया जुसे उसके
08:28समर्थक समावेशी समझ होता केते। विरूधी से तुष्ट्रिकरन और एतिहासिक समझ होता केते हैं।
08:46और शायद सबसे एहन बात ये है कि किसी राष्ट्य प्रतिक का इतिहास समझने के लिए सिर्फ आज की राष्ट्य
08:52को नहीं बलकि उस समय की परस्तितियों को, नेताओं की बहसों को और उनके लिए गए फैसलों को उसके पूरे
08:58संदर्व को देखना जरूरी है।
09:17लेकिन उससे जुड़ी बहस आज भी भारत की राजनीती इतिहास और राष्ट्य पहचान के सबसे सम्मेदमशील सवालों को सामने ला
09:25रही है।
09:46ये राष्ट्य गौरव इतिहास को सभी जान पाए। और दिखते रहे हैं वन इंडिया है।
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