00:00मेरा अपने ये मानना है कि शेर दाड़ता है, आती चिंगाड़ता है, कुत्ता भोगता है, हमारे शब्द ही हमारे सम्मान
00:09के पतीग होते हैं, और हमारे शब्द ही हमारे अपमान के कारक होते हैं, तो निश्चित रूप से, भाशा के
00:15उपर दो में निश्चित रूप से ध्या
00:27हानाट है उसके अमंचन बापु से बागार में संपन होने जा रहा है तो मैं उसके परफॉर्मिंस के लिए आया
00:34हूँ रही बात ये कि मरवयादा पुर्षूत्र श्री राम के उपर जितना भी बनाया जाए हजारों वर्षों से हजारों लोगों
00:42ने लिखा है और हजारों वर
00:48बनाने के परशाद एक ही बात लिखी है लिखने के परशाद एक ही बात लिखी है कि हरी अनंत हरी
00:54कथा अनंत मतलब हमारी दृष्टी की सीमा है उनकी सिष्टी की कोई सीमा नहीं है तो हमें अपनी दृष्टी की
01:03सीमा को उनकी दृष्टी की सीमा मान के किसी भी चीज़ को म
01:18उसे तो परमिश्वास है कि जब हमने हमारे नाम का हमारा जो महानाटे बना नाटक बना और वो बहुत अध्वुत
01:25लोगों ने 500 के ऊपर शोज उसके हो चुके हैं और आयम पटना में यहां पर बंद करने जा रहे
01:31हैं तो निश्चित रूप से क्योंकि कथा ही इतनी विलक्ष
02:01हमसे ही अपनी कोई बात नहीं कहेंगे हमारा वविष्ट जो है उसे आप किस तरीके से
02:07आप जिस तरीके से देखते हों तरीके से हम भी कही ने इपने भर्ष को जुल बनाना चाहरे हैं
02:12तो मैं इसको आंदूलन और करांती में अंतर होता है
02:16आंदूलन विशेगत होता है
02:18कुछ समय के लिए होता है जो कही ने गहीं
02:21गर में रहने बढ़े लोगों को सजग करता है, उन्हें चौकन ना करता है, और उन्हें उनकी तरफ देखने के
02:27लिए विवश्च करता है।
02:29तो मेरा अपने मानना है कि युवा जो भी है वो आपका ही हमारे भारत परश का युवा है जितनी
02:36महपत हमको आपको है उतनी महपत आप अपने घर में जितनी महपत अपने पिताजी से करते होंगे उतनी महपत आपके
02:43पिताजी माताजी आपसे नहीं करते हैं पिल्कुल करते ह
02:47कभी किसी किसी विचार विवस्ता को लेकर आपको और माता पिता जी के बीच में मतवेद होते हैं के नहीं
02:53होते हैं तो क्या हम माता पिता जी आपको खारिच करने लगेंगे
02:57कि ये क्या बात कर रहा है, मेरा अपना ये मानना है, कि ये तो एक ऐसी चीज हमारे ही
03:03हुआ है, तो हमारा हित, उन्हीं के हाथ में तो आने वाले समय में हमारा राश्ट रखा जाना है, कंदे
03:09के उपर, क्योंकि आप जैसे ही देखते हैं, कि जब भी कभी कोई पीडी पुरानी
03:14होती है, तो हमेशा हम ये चर्चा करने लगते हैं, कि पीडियों के बीच में वैचारिक मत्वेद है, नहीं, वैचारिक
03:22मत्वेद नहीं होता, ये पीडियों की अपनी अपनी समझ होती है, उस समझ के इंदो सामंजस से स्थापत करने के
03:28लिए, जब जो जो थोड़ा बहुत
03:30कहीं न कहीं जो हिलाओ होता है वो मेल के लिए होता है
03:38बोल दिया हमने ये तो आधिया प्रद्हान मंगना रनौइद में इस परिके से बयान दिया
03:44कहा जेन जी को कि बत्सूरत और दस्ट है कैसे देख रहे हैं उनके इस बयान को
03:48देखिए मेरा अपने ये मानना है कि शेर दाड़ता है हाथी चिंगाड़ता है कुटा भूगता है तो किसी भी जीव
03:57की पहचान उसके स्वर्द से निकलने वाले कंट से होती है
04:00इसलिए भाशा का बड़ा महत होता है भाशा के मामले में हमारे यहां पर अक्सर कहा जाता है
04:18आपको उसके पैर के नीचे डाले जाने वाला दंड मिलता है हमारे शब्द ही हमारे सम्मान के पती होते हैं
04:25और हमारे शब्द ही हमारे अपमान के कारक होते हैं
04:28तो निश्चित रूप से भाशा के उपर दो मैं निश्चित रूप से ध्यान बढ़ना चाहिए किसी भी साथ से.
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