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महादेव की भक्ति की शक्ति, देखें कांवड़ यात्रा की अद्भुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय कहानी

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00:07एक दिन में आप कितने किलोमीटर चल सकते हैं दस, बीस, पचीस पर अगर बिना रुके, बिना बैठे या आप
00:16बिना आराम किये, बिना कुछ भी खाए, नंगे पाउं, कंधे पर वजन उठा कर कितनी दूर तक आप चल सकते
00:22हैं
00:22नमस्कार मैं हूँ श्वेता सिंग और आज ये अविश्वस्निय सवाल आप से पूछने की वज़े है सावन के महीने की
00:29शुरूआत
00:30और सावन में कावड की अद्बूत परंपरा क्या आप जानते हैं कि देश के पूर्वी राज्यों में डाक बम का
00:37ऐसा प्रचलन है
00:37जहां एक भक 24 घंटे से कम समय में 105 किलो मीटर की यात्रा कंधे पर कावड के साथ पूरी
00:46करता है
00:47बिना रुके बिना कुछ भी खाए बिना सुस्ताए अकेले अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग परंपरा हैं
00:54वो हम आपको बताएंगे और सावन के महीने में अपने साथ अद्भुत और विश्वस्निये और कल्पनिये कावड यात्रा कराएंगे
01:07ओं नमः पार्वती पते हर हर महादेव
01:35रास्ते अलग-अलग अंदाज अलग-अलग शहर अलग-अलग परंपराएं अलग-अलग लेकिन मंजिल सबकी एक महादेव
01:51आम रास्ते आस्था के पवित्र पत बन जाते हैं भक्त खुद श्रद्धा का रूप बन जाते हैं
01:57यह सावन के महीने में भोले के भक्तों की कावड यात्रा यानि दुनिया की सबसे बड़ी अध्भुत धार्मिक यात्रा
02:04जिसके हर कदम पर कोई न कोई अविश्वस्निय अकल्पनिय मान्यता है
02:35अविश्वस्निय है 24 घंटों के अंदर डाक बम कामवड यात्रियों का 105 किलो मीटर की यात्रा दोड़ कर तै करना
02:45अब लग लग वाग 22 किलो मेटर आचके हैं
03:02अकल्पनिय है नंगे पैर सेकड़ों किलो मीटर कंधों पर कावड लेकर आस्था के नियमों के अनुसार चलना
03:11लेकिन अद्भुत है शिव भक्तों को शरीर के सहने की सीमाओं को तोड़ते हुए जलाभिशेक की तपस्या करते हुए देखना
03:19कोई निकल पड़ा है महादेव का जलाभिशेक करने दंडवत मुद्रा में सैकड़ों किलो मीटर लोटते हुए चलने के लिए
03:34कोई निकल पड़ा है कावड को कंधे पर रखकर हजारों किलो मीटर तक बिना रुके बिना आराम पिये बस चलते
03:41रहने के लिए
03:44ना कोई टिकट ना कोई तै आयोजन लेकिन करोडों शिवभक्त निकल पड़ते हैं अद्भुत अनुशासन के साथ उस यात्रा पर
03:52जो जितनी अद्भुत है उतनी ही चमतकृत करने वाली थी
03:58आज से 12 साल पहले कावड ले नहीं आएजे और जम से लेके जा रहे है बोले बाबा की फुल
04:03किरपाया जी और यहां पर आने से मेरी बहुत सी मनोकामना शिद्दू ही है और मैं यही कामना करूँगा कि
04:09जो भी हम बक्त आते हैं मन से भाव से आएं और जल अर्पन करें और �
04:13बाबा का इस्वर्ण करें तो उसके सारी मनोकामना बहुत जल पूर हो जाएं हम बताएंगे कि वो कौन थे जिन्होंने
04:27उठाई थी पहली कावड हम बताएंगे कि क्या है बाबा बैद्यनाथ में जलाभिशेक की अध्भुत महिमा
04:39हम बताएंगे कि क्यों सावन में हर शिवालय महातीर्थ बन जाता है
04:55सबसे पहले सबसे अकल्पनिय परंपरा के बारे में बताते हैं जो बिहार जार्खन के क्षेत्र में प्रचलित है
05:02यूँ तो बाकी हिस्सों में भी डाक कावड की परंपरा है जो 24 घंटे में पूरी करनी होती है
05:08लेकिन वहाँ एक समू यानि एक ग्रूप साथ रहता है पर बिहार जार्खन में एक अकेला महादेव का भक्त
05:15जिने कहा जाता है डाक बम ये भोले के वी वी आईपी भक्त होते हैं
05:46बाबा के बुलावे पर दोड़े चले जा रहे है
05:49पाव में कंकर चुभे तो भी जैशिवशंकर
05:54पाव में छाले पड़े को तब भी जैशिवशंकर
05:59पिहार जार्खन के बीट सावन के महीने में आस्था कि ये ऐसी अग्वुत तस्मीर है
06:04जो संसार में कहीं और नहीं मिलती
06:09सुल्तान गंद से गंगा जल भर कर देवघर बाबा बैदेनात जियूतिर लिंग पर जलाविशेक करना है वो भी 24 घंटों
06:17के भीतर
06:17इस बीच 105 किलोमीटर की यात्रा तै करनी है वो भी बिना रुके न नींद न भूख न पल भराराम
06:26न दोड़ने की गती जरा भी धीमी
06:28ये है विश्व की समसे अनोखी भक्ती का अद्भुत अविश्वस्निय अकल्पनिय रूप डाक बम
06:4024 घंटों के अंदर 105 किलोमीटर की यात्रा नंगे पाउं तै करनी है रास्ते में पढ़ने वाली जलेविया पहाड की
06:49खड़ी चढ़ाई भी होसले तोड़ नहीं सकते
06:51सुईया पहाड के सुई जैसे चुबने वाले नुकीले पत्थर पेरों को लहुलुहान तो कर सकते हैं लेकिन महादेव के प्रती
06:58भक्ती के भाव को जरा भी दिगा नहीं सकते हैं
07:01इसी विश्वास के साथ डागवम कामडिये ये और साधारण और कल्पनिये आध्यात्मिक याप्त्रा पूर्ण करते हैं
07:14जागवम की विशेष्टा यही है कि जाकरके आपको सुल्तान्यज में जहनिवी गंगा उत्तरवायनी से जल लेके
07:2224 घंटे के अंदर बावा बेज्देनात को जलारपन करना है यह बहुत ही कठीन यात्रा है भूक पिसाब पेखाना सब
07:31कुछ रोकते हुए आपको वहां पहुंचना है और जो यात्री सफलता पुरुवग इस कर्म को कर लेते हैं उनकी हर
07:38एक मनो कामना बावा बेज्देनात
07:41पूरा करते हैं यह महत्तु है इसका और यह सबसे संभव नहीं है जाने का तो हजारों रोज जाते हैं
07:50डागम लेकिन कुछ बेक्टि कुछ यात्री ही जाकरके सेक्सेस हो पाते हैं
07:55कहा जाता है कि डाकबम के कावडिये यानि वो भक्त जिने स्वैम महादेव बुलाते हैं
08:01भक्त भगवान का संदेशा पाकर दोड़े चले जाते हैं और जलाविशेक कर अपनी शद्धार अरपण करते हैं
08:07ये पूरी यात्रा अद्भुद धार्मिक मान्यताओं का विराट रूप है
08:37से मन इस्ठीर हो जाता है डाकबम की कावड यात्रा प्रारंब होती है सुल्तान गंज में उत्तरवाहिनी गंगा के तक
08:45पर स्थापित अजगेवी नाथ प्राचीन मंदिर से और समाप्त होती है
08:50दियोघर में बाबा बैदेनाज जोतिर लिंग पर जलाविशेग के साथ अजगेवी नाथ मंदिर के बारे में कहा जाता है कि
08:56वो त्रेता युग के समय से है
08:58अज का अर्थ अजन्मा गैवी का अर्थ अद्रिश्य और नाथ का अर्थ स्वामी यानि अनंत अविनाशी अद्रिश्य शिव का स्थान
09:08जहां ये मंदिर है वहां गंगा उत्तर वाहिनी है वारणसी के अलावा सिर्फ यही एक स्थान है जहां गंगा उत्तर
09:16की ओर बहती है भगवान शिव को उत्तर दिशा का स्वामी भी माना जाता है
09:22सावन में भक्त इसलिए सुल्तान गंज से ही गंगा जल भरते हैं
09:27और भगवान शिव के बारज जोतिर लिंगों में बिहार जारखंड में बाबा बैदिनाद धाम ही एक मात्र जोतिर लिंग है
09:34तो वही जल चड़ाते हैं
09:37डाक बम कावड की मान्यताएं और संकल्प यदि अध्वुत लग रहे हैं तो आपको इसके अविश्वस्निय और अकल्पनिय पहलू से
09:45भी परिचित कराते हैं
09:46खेलों में लंबी दूरी का जो मारथन रेस होता है उसमें एक आथलीट को 42 किलोमीटर तक दोड़ लगानी होती
09:53है
09:54खेलाडी रास्ते में एनिजी ड्रिंक्स पी सकते हैं वही एक डाक बम गंगा जल लेकर 105 किलोमीटर लगातार दोड़ता है
10:02अगर वो रास्ते में कुछ खाएगा या पीएगा तो कावण अशुद्ध हो जाएगा रुकना ठकना यहां तक की शौट जाना
10:09भी मना है
10:10और कावण इनसान या जानवर किसी के शरीर को छूबी गया तो तपस्या बेकार
10:17मुजफर्पूर की अब रिटायर्ड शिक्षिका क्रिश्ना बम ने लगभग चार दशक तक डाक बम के रूप में जलाविशेक किया
10:24एक समय में वो एक लौती महिला होती थी जो 105 किलोमीटर की यात्रा करती थी
10:29और वो भी केवल 17 से 18 घंटों में पूरा कर लिया करती थी यानि हर घंटे करीब 6 किलोमीटर
10:38दोड़ते हुए वो चलती थी अब वो 74 साल की हो चुकी है स्वास्तिय संबंधी कुछ समस्याएं है लेकिन डाक
10:45बम के रूप में शिवभक्ति को लेकर उनका उत्साह आज भी अ
10:59तक सावन के प्रतेक संबाडी 42 वर्सों तक 16 घंटे में सुल्तान गन से बैद नाध्धाम डाक कामर के रूप
11:09में अनवरत चल कर बिना रूपे हुए पैदल चलाती रही हूँ अभी भी मैं बील पावर से स्ट्रॉंग हूँ सारीरी
11:17क रूप से दोनों घुटना तो तूट �
11:18किया मेरा यही रास्ते में ट्रेन में जाने में एक आदमी तोड़ा एक और रास्ते में लेकिन बाबा की ऐसी
11:24किर्पा है कि मैं उसी से सलती हूँ
11:2724 घंटों के अंदर ही जलाबिशेक करने की बाद्धिता के पीछे भक्तों का संकल्प होता है जो अद्बुत हट योग
11:35और तपस्या का रूप है
11:36यदि कोई इस तैस समय में जलाबिशेक न कर पाए तो उसका संकल्प टूप जाता है
11:42बोले शंकर के भक्त किसी भी कीमत पर अपने संकल्प को टूपने नहीं देना चाहते हैं इसलिए जल चरहाते समय
11:49बाकी भक्तों के लिए भले ही अलग व्यवस्था हो लेकिन डाग बम के लिए एक वी वी आईपी रूट खुला
11:56होता है
11:57इसलिए तो हम कहते हैं यह भद्वान भूले के वी वी आईपी भथ है दाग बम नाम इसलिए पढ़ा क्योंकि
12:06वह 24 घंटा उनका पैर चलते रहना चाहिए
12:10दाग बम का डियाम है यह से कि आप जहां से जल जो उठाईएगा आपको जो परची मिलता है परची
12:16को नुसारा आप जल उठाते हैं तो वह 24 घंटा के अंदर जल आपको चड़ाना है अब पैर आपका कदम
12:24चलते रहे पैर रुकना नहीं चाहिए अगर आपका पैर रुक �
12:28तो वह जल पे कुंटी हो जाएगा वह डाग नहीं रहेगा या 24 घंटा के बाद आप अगर देवघर पहुंचते
12:35हैं तो वह जल पे कुंटी हो गिया वह डाग जल नहीं रहे दाग कावण लेकर भक देश के दूसरे
12:42हिस्तों में ही निकलते हैं जैसे हरिद्वार से पलवल �
12:58कावण ये होते हैं जब एक खत जाता है तो दूसरा उसे लेकर भाणता है इनके बाद की कावण ये
13:04तब तक गाड़ी में सबार होकर आगे चलते हैं पर ये भोले की भक्ती की शक्त नहीं है कि इतनी
13:10लंबी धूरी तक उमस भरे मौसम में नियमों का पालन करते हुए जाग
13:16कावण कखिन यात्रा पूरी कर पाते हैं
14:11प्रतेक डाक बम की मंजिल है बाबा बैदिनाद धाम
14:17जहां पहुँचने की इच्छा उनके रास्ते की हर पाधा को हर लेती है
14:22अध्धुत है ऐसी आस्था जो भक्तों के कठिन व्रत के कारण उन्हें भी देव तुल्य बना देती है
14:40जहां हर पत्थर और हर जयकारे के बीचे हजारों साल पुरानी मान्यताये हैं
14:53विश्व में ये एक मात्र शिवधाम है जहां शिखर पर त्रिशूल नहीं बलकि पंच शूल होता है
15:04और विश्वसनिय रूप से दुल्लब है महादेव की यहां महिमा जहां शिव के साथ शक्ति भी विराजमान है
15:13और विश्वसनिय है यहां की प्रती शथालूँँ की शथा जिसने देवघर को महातीर्थ बना दिया
15:22बाबा की दर्बायर में हमेशा भत्तों का ताता लगा रहता है लेकिन हर साल सावन के महीने में मंदर की
15:29छटा ही कुछ और हो जाती है
15:32लाखों कावडिये 100 किलोमीटर से अधिक की यात्रा पैदल चलकर गंगा जलसे बाबा का अभिशेग करने पहुंचते हैं
15:40अम रितवानी है सीवा सीवा सीवा सीवा हो जाता है यह रावन के दुवारा लाए गए है और रावन ने
16:05ही सावन में पहला कामर लाके यहां चड़ाया हुआ था
16:07इसी वज़ा से यहां का महत्व जाते होता है शीव के भक्तों में सब से उपर है रावन इसलिए उनके
16:14नाम से रावनिश्वार वैद्दनाथ भी रखा गया है और सावन का जो महत्व है उन्हीं के दुवारा कामर पहला लाके
16:20यहां चड़ाया गया
16:21बाबा का मानता है की जो मुराद मांगे उसा पूरा होता है बाबा देते हैं इसलिए आते हैं हम लोग
16:26बहुत अच्छा है बाबा की नगरी है बहुत सा अपाशाली लोग यहां पर आते हैं
16:51बैदिनाद धाम की सबसे बड़ी विशेशता यही है
16:54कि ये केवल 12 जोतिरलिंगों में से एक नहीं है
16:58बलकि ये उन दुरलब तीर्थ में है
17:01जहां जोतिरलिंग और आदी शक्तिपीट एक ही परिसर में है
17:20एक और भगवान शिव दूसरी और आदी शक्ति यानी शिव और शक्ति एक साथ
17:28भक्तों के लिए ये विशेश है कि शिव जी की पूजा के साथ शक्ति की आराधना भी हो जाती है
17:34एक साथ भगवान शिव और माता पारवती का अशीरवाद मिल जाता है
18:04कि सब्सक्राब को खुस रखें आणंद में रखें यहीं का अवना के साथ हर हर महादे जये वावावत इनाथ
18:09वावावेटनाथ के नगली में गेर्वार् के सजिया रहा रहना कामरिया पूरी मंगर में महाद चुके हैं
18:34वो पवित्र स्थान है जहां माता सती का रिदय गिरा था
18:51बाबाबेदेनाः जोतिरिंग अन्य शिवधामों में दोनाता है
18:59त्रशूल आता हैहां में होता है लेकिन बाबेदेनाः धाम के शिखर पर त्रीशूल नहीं पंच शून स्थापित आव
19:09जो है ना ये पंचिसूल ही सब दिया आता है यहां तिरशूल नहीं है कहीं इसका है कि पाँच कोस
19:15तक यहां कोई भी घटना नहीं घट सकता है यह पंचिसूल को तर अच्छा करते हैं
19:41यह पाँचिन काल से रावर के द्वारा ही तभी से लगाया गया है और अभी तक यह विराजमार है
19:47यह पाँच नुकीले शूल पंच तत्वों का प्रतिनेदित्व करते हैं जिनसे इंसानी शरीर बना है
19:56यह पाँच तत्व हैं पृत्वी, अगनी, वायू, आकाश और जल और पंच शूल इंसानों के पंच विकारों को नश्ट करने
20:06का भी प्रतीक हैं
20:07जिन्हें काम, क्रोध, लोब, मोह और इर्शा माना गया
20:19वायू, जिन्हें और जो भी मांगते हैं, बाबा जो है, सारी एक्षाइ हम लोगी पूरी करता हैं, हम लोग हर
20:27साल यहां आते हैं
20:43देवगर में बाबा बैद्यनाद जोतिरलिंग युगों पुराना है और तब से ही भक्तों के लिए तीर्थ है
20:53कहा जाता है कि लंका के राजा रावण ने भगवान शिव को प्रसंद करने के लिए घोर तपस्या की
21:02अपने चिर एक एक करके भगवान शिव को अर्पित कर दिये
21:07भक्ती से प्रसन्न होकर शिव स्वयम वैद्य बने यानी डॉक्टर और उन्होंने रावण के सभी सर फिर से जोड़ दिये
21:16तभी से भगवान शिव का एक नाम पड़ा वैद्यनाथ यानी रोग हरने वाला जीवन देने वाले महादेव
21:26बाबा वैद्यनाथ देवघर में कैसे स्थापित हुए इसकी मानेता भी अग्भुत है
21:33रावण भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे और एक बार ऐसी कथा मिलती है हमारे धर्म ग्रंथों में कि
21:42वो हिमालय जाकर के कठोर तप करते हैं और रावण को दसानन भी कहा जाता है उनके दस सिर थे
21:49तो एक एक सिर काट करके शिव चंडों में अर्पित करते हैं
21:53जब दसवा सिर रावण काटने लगते हैं तो भोले नात प्रसंद होकर के रावण के सामने आ जाते हैं और
22:01रावण से पूछते हैं कि बताओ आपकी क्या इच्छा है तो रावण कहता है उनसे कि आप लंका चलिए मैं
22:09आपको अपने इस्थान लंका ले जाना चाहता हूँ
22:12तो भगवान शिव मुश्कुराते हैं और कहते हैं ठीक है हम चलेंगे लेकिन ध्यान ये रखना कि ये जो हमारा
22:20स्वरूप है शिव लिंग जिसको तुम लंका ले जाना चाहते हो उसका नाम था कामना लिंग तो कामना लिंग को
22:28रावण लंका ले जाना चाहता था तो भग
22:44तब देवता परेशान हुए कि रावन तो भगवान को ले करके जा रहा है लंका तो उन्हों ने भगवान विश्णु
22:53के सामने
22:54अपनी चिन्ता जताई तो भगवान विश्णु ग्वाले का रूप धारण करके रावन को रास्ते पर मिले और प्रभु मैंना से
23:03रावन को 1960
23:10विष्णु को देखा और उनसे कहा कि थोड़े समय के लिए तुम ये शिवलिंग पकड़ लो इसे जमीन पर मत
23:16रखना मैं लगुशंका करता हूँ
23:19तो रावन लगुशंका करने गया भगवान विष्णु जो ग्वाले के रूप में थे उन्होंने शिवलिंग को रखा
23:26लेकिन वो शिवलिंग बहुत भारी था और भगवान ने उसे जमीन पर रख दिया
23:31और जब रावन लोट कर आया तो देखा भईया तुमने ये क्या कर दिया बहुत भारी था मैं समभाल नहीं
23:37पाया
23:38और वो शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया वही जो है बैद्यनाद धाम है आजकल जारखंड में वो इस्थान है बैद्यनाद
23:46धाम और ये बारह जोतिर लिंगों में से एक प्रमुख जोतिर लिंग है
23:53भक्तों को विश्वास है कि बैद्यनाद धाम में शिवजी साक्षात रूप में विराजे हैं और वहाँ जलाभ शेक का पुन्य
24:00उनके हर कश्ट को दूर कर देगा
24:06अब हम आपको समय में पीछे लिए चलते हैं और बताते हैं कि सडकों पर एक महीने तक जो लाखों
24:13लोगों को कावड यात्रा करते हुए आप देखते हैं उसकी शुरूआत कब हुई थी
24:18क्या कावड यात्रा की शुरुआत भगवान परशुराम ने की थी
24:22या इसका संबन्द श्रवण कुमार की सेवा भावना से है
24:25या फिर इसकी जड़े समुद्र मंधन के समय से मानी जाती है
24:28आखिर क्यूं कावड यात्रा को कोई परंपरिक यात्रा नहीं
24:32बलकि सनातन संस्कृती का जीवन तो रूप माना गया है
25:03कामड यात्रा कब शुरू हुई? ये यात्रा कितनी प्राचीन है? किस ने उठाई थी पहली कामड? इन सवालों के जवाब
25:10कई प्रचलित मान्यताओं में मिलते हैं
25:31कहा जाता है पहला कामड या रावन था और रावन ने हरिद्वार से जल भर कर बागपत जिले के पूरा
25:39महादेव मंदिर में शिवलिंग पर जलाविशेक किया था
25:43समुद्र मन्थन का विश भगवान शिव ने पी लिया था तो विश के असर को कम करने के लिए रावन
25:48ने जल चलाया था
26:01एक दूसरी मानिता के अनुसार भगवान परशुराम ने गण मुक्तेश्वर से गंगा जल लाकर पूरा महादेव मंदिर में जलाविशेक किया
26:10था
26:10तो उसके बाद से ही ये परंपरा बन गई जो अब तक शिव भक्तों द्वारा कयम
26:24भगवान परशुराम जो की भगवान विश्णू के छठे नंबर के अवतार माने जाते हैं
26:31उन्होंने आजकल जो उत्तरप्रदेश का बागपत का इलाका है वहाँ पूरा महादेव नाम का एक प्राचीन मंदिर है
26:40उस मंदिर में गढ़ मुक्तेश्वर से जिसे आजकल ब्रजगाड भी कहते हैं
26:45वहां से जल ला करके, गढ़ मुकतेश्वर से जल ला करके पूरा महादेव को अरपित किया था और कावड का
26:53प्रियूक किया था
26:54तो इसलिए कुछ जो धर्म के जानकार है भगवान परशुराम को पहला कावडिया मानते हैं
27:05यहां पुरा महादेव मंदिर का आध्यात्मिक महत्व भी समझा देते हैं
27:11कहा जाता है कि जहां आज पुरा महादेव मंदिर है उसे कभी कजली वन कहा जाता था
27:16कजली वन में भगवान परशुराम के पिता महर्शी जमदागनी और माता रेणुका रहती थी
27:22बाद में भगवान परशुराम ने यहां शिवलिंग स्थापित किया और इस्थान का नाम शिवपुरी रखा जो धीरे धीरे शिवपुरा और
27:30फिर सिर्फ पुरा रह गया
27:32महादेव का मंदिर होने के कारण इसे पुरा महादेव कहा जाने लगा
27:48एक मानिता ये भी है कि अयुध्या के राजा बनने के बाद श्री राम ने अपने चारों भाईयों के साथ
27:53सुल्तान गंज से जल लेकर देवगर में बाबा बैदिनाद धाम पर जलाभिशेक किया था जिसके बाद से ये क्रम अन्वरत
28:01जारी है
28:18कहीं कहीं ये भी वर्णन मिलता है कि श्रवन कुमार ने कावण में अपने माता पिता को बिठा कर तीर्थ
28:24यात्रा की और इस दौरान जलाभिशेक भी किया तब से ही कावण और जलाभिशेक की परंपरा शुरू हुई
28:30कि श्रवन कुमार की जो कथा है वो बड़ी प्रसिद्ध है ऐसा माना जाता है कि त्रेता युग में श्रवन
28:40कुमार ने अपने
28:43अंधे माता पिता को तीर्थ यात्रा कराई थी उनके माता पिता की इच्छा थी कि वो हरिद्वार जाकर गंगा इश्नान
28:49करें
28:49तो स्रवन कुमार ने कावड बनाई एक तरफ माता को बठाया एक तरफ पिताजी को बठाया और उन्हें हरी द्वार
28:58ले गए गंगा इश्नान कराया और लोटते समय वहां से गंगा जल लेकर के आये थे और फिर शुब मंदिर
29:06में अविशेक किया था तो स्रवन कुमार को भी
29:09कावडिये के रूप में देखा जाता है
29:17सामान्य तोर पर कावडिये गंगा नदी के करीब स्थिक जोते लिंग और प्रचलित मंदिरों में शिवलिंग का जलाबिशेक करते हैं
29:25उत्तर भारत के लोग इस जल को मेरट में पढ़ने वाले मंदिरों जैसे मेरट के ओघर नाथ मंदिर, बागपत के
29:31पुरा महादेव मंदिर, गाजयाबाद के दुधेश्वर नाथ मंदिर में चड़ाते हैं
29:35वहीं अवद क्षेतर और पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग जल को बारा बंकी स्थित लोधेश्वर महादेव मंदिर, अयोध्या
29:44के क्षिरेश्वर महादेव मंदिर में चड़ाते हैं
29:48कावड यात्रा में जलाविशेक के लिए दो प्रमुख जयोतेर लिंगों का विशेश महत्व है, एक देवघर में बाबा बैदेनात धाम,
29:56दूसरा काशी में बाबा विश्वनात धाम
29:58जारखन के दुंका में बाबा बासुकी नाथ मंदिर में भी कावडियों का तांता लगा रहता है
30:06कावडियों का लक्ष एक होता है भगवान शिव का जलाभिशेक
30:14लेकिन जैसे उनके तरीके अलग-अलग होते हैं उसी तरह कावड भी अलग-अलग तरे की होती है
30:20ये अलग-अलग तरे की कावड अलग नियम और तपस्या का प्रतीक होती है और इसी के साथ जुड़ी होती
30:27है हर कावड ये की अलग कठिन साधना
30:47अद्बुत होता है वो द्रिश्य जब केसरिया बाना पहले हजारों लाखों शिव भक्त जैकारों के साथ सडकों पर निकलते हैं
31:00दूर से एक ही रंग में रंगे प्रतीत हो रहे कावड यातरी अलग-अलग संकल्पों के साथ आगे बढ़ते हैं
31:06अलग-अलग संकल्प के कारण ही कावड के भी अलग-अलग रूप नज़र आते हैं
31:12कावड रंग रूप आकार में कई तरह की हो सकती है
31:16लेकिन कावड यात्रियों के संकल्प के अनुसार मुख्य रूप से ये चार तरह की होती है
31:22जिन में बिना रुके सीमित समय में जलाभिशेक वाली डाक कावड भी शामिल है
31:27डाक कावड के अलावा एक होती है सामान्य कावड
31:41इसमें भक्त जल लेकर धीरे धीरे आगे बढ़ते हैं
31:44इसमें कावड यात्री बीज में आराम भी कर सकते हैं
31:47और सीमित रूप से कहीं कहीं बाहन का प्रयोग भी करते हैं
31:51हालांकि यात्रा का अधिकांश भाग पैदल ही तै करना होता है।
31:58इस कावण का सख्त नियम होता है कि इसे कभी भी जमीन पर नहीं रखा जाएगा।
32:04भक्तों को बारी-बारी से इसे कंधों पर लेकर ही चलना होता है।
32:08जब कोई कावण यात्री आराम करता है तो उसका कोई साथी उसकी कावण को अपने कंधे पर लेकर चलने के
32:14अंदाज में हिलाता रहता है।
32:16बेहत कठिन और शरीर को पीडा देने वाली कावण होती है डांडी कावण।
32:24इसमें कावण यात्री गंगा के तट से शिवाले तक दंड बैठक लगाते हुए आगे बढ़ते हैं।
32:41पहले चलन में थे और कई श्रद्धालू आज भी उनका पालन करते हैं।
32:46राजस्थान के मारवाडी समाज के लोग या उनके पुरोहित गंगोत्री या मुनोत्री और गोमुक तक पैदल जाते थे और इन
32:53पवित्र स्थलों से जल लेकर वापस लोटने के बाद जला भिशेक करते थे।
33:27उन्हें भी कावडियां कहा जाता था।
33:28तमिल नाडू में प्रवेश करते थे।
33:30और रामेश्वरम द्वीप पर भगवान शिव के जो तिरलिंग पर जला भिशेक के साथ उनकी आध्यात्मेक यात्रा समाप्त होती थे।
33:38इसमें 5-6 महीने लग जाते थे।
33:40आज भी कई शिव भग पूरे मनोभाव से इस तरह की कावड यात्रा करते हैं।
34:14सावन का महीना इतना पवित्र क्यों माना जाता है।
34:19धार्मिक मानिताओं के अनुसार सावन को पवित्र और आध्यात्मिक उर्जा का महीना माना गया है
34:25शिवराधना को समर्पित इस महीने में कुछ विशेश नियम भी बताए गये हैं
34:31जिनका आधार धार्मिक तो है ही वैज्यानिक रूप से भी उन्हें समझा जा सकता है
34:39सावन के बहीने में ये मानिता है कि नौन्विज खाना यानी की मासाहार नहीं किया जाता
34:44साथी शराब भी नहीं पिया जाता तो ऐसा क्यों?
34:55इसका धार्मिक कारण ये है कि भगवान शिव की अराधना के लिए सात्विक और संयमित आचरण होना चाहिए
35:02वैज्यानिक कारण ये है कि आयूर्वेद के अनुसार वर्षा रितु में पाचन शक्ती कमजोर होती है
35:08जिससे पेट के रोग हो सकते है
35:10साथी इस मौसम में बेक्टीरिया अधिक तेजी से बढ़ता है जो फूड पॉइजनिंग का कारण बन सकते है
35:17इस महीने में रोग प्रतिरोधक शमता कम होती है और शराब शरीर में जल संतुलन बिगाड सकती है
35:24जिसके कारण मास पेशियों में दर्ग किड्नी आधि पर बुरा असर अधिक होता है
35:30मास और मदिरा तामसिक चीजें हैं इनको सेवन करने से व्यक्ति का जो सत्व तत्व है वह कम होता है
35:39और इसमें व्यक्ति को इस मास में सात्विक रह करके भगवान सिव का पूजन करना होता है
35:45इसलिए इसमें मास और मदिरा का सेवन वर्जित किया गया है
35:50जो मीट होता है वो डाइजेशन वाइज टफ होता है हमारे डाइजेशन के लिए इसलिए उसको पहले हम लोग कुकर
35:59बगर में पकाते हैं तो इस समय हमारे बॉड़ी का जो डाइजेस्टिव पावर होता है वो वीक होता है वर्षा
36:04रितु में अगनी हमारी कमजोर होती है अल
36:23सावन में अधिकतर लोग दाड़ी बाल नहीं कटवाते तो इसके पीछे क्या वज़े हो सकती है
36:31धार्मिक कारण ये है कि शिव भक्ती के लिए सांसारिक बनावट से दूर रहने के लिए इसे तपस्या की तरह
36:38समझा जाता है
36:39भग्वान शिव स्वयम जटाधारी हैं तो लोग श्रधा वश भी ऐसा करते हैं
36:44वैज्यानिक कारण ये है कि माना जाता है कि बारिश के महीने में फंगल इंफेक्शन और तवचा संबंधित बीमारियों का
36:50खतरा ज्यादा होता है
36:51बाल प्राकृतिक अवरोध की तरह काम करते हैं
37:21तो इस समय तो इनका बढ़ना होता ही है शरीर हमारा गीला रहता है बाहर गर्मी रहती है पसीने से
37:27मगीले रहते हैं
37:28तो सामने तो देखा भी जाता है कि फंगल इंफेक्शन इस रितू में बढ़ते हैं
37:33कुछ लोग सावन भर प्याज और लहसुन का प्रयोग भी बंद कर देते हैं उसकी वज़े भी जान लीजिए
37:41धार्मिक कारण ये है कि प्याज लहसुन को तामसिक और राजसी आहार में गिना जाता है
37:46जो आलस और सुस्ती बढ़ाते हैं और जिसके सेवन से साधना और मन की एकागरता कम होती है
37:52वैज्यानिक कारण ये है कि पाचन परतरिक्त भार न पड़े क्योंकि इस मौसम में पेट अधिक समवेदनशील होता है
37:59सावन के महिने में प्याज लासुन इसलिए परहेच किया जाता है क्योंकि यह तामसि आहार माना जाता है
38:05मंत्र आधिका जो भी प्रयोग हम लोग करते हैं तो उसके में हमारी दुरगंद आएगी
38:10तो हमारी जो पूजा पाठ है वह सुगंधित है और आध्यात्मिक स्रिष्टता के लिए मानी जाती है
38:17तो तामसि आहार के रूप में प्याज लासुन का प्रयोग होता है तो इसलिए इनका प्रयोग नहीं करते हैं
38:24चुकि ये अमल और तीशड होता है इसलिए अगली रितु में पित्त का प्रकोफ होने वाला रहता है इसलिए इसको
38:31सन्यमित मात्रा में हमको इस रितु में लेना चाहिए
38:34दही और कड़ी जैसे आहार भी न खाने की सलाह सावन में दी जाती है
38:42धार्मिक कारण ये है कि भगवान शिव को अरपन किया जाता है इसलिए उसका प्रयोग सावन में आध्यात्मिक रूप से
38:48ही करना चाहिए
38:49वैज्ञानिक कारण ये है कि बारिश के मौसम में दही और कड़ी आदी से कफ और वात यानि वायू संबंधी
38:55रोग हो सकते हैं जो शरीर में दर्द और ग्यास जैसी तकलीफ बढ़ाते हैं
39:00सावन के महिने में दूद दही कड़ी का प्रयोग इसलिए नहीं करते हैं क्योंकि सावन का महिना बैक्टिरिया भी उत्पन
39:07करता है
39:08दूद सावन के महिने में संकरजी को चाड़ता है तो लोग भगवान भोले लात के लिए भी वह प्रयोग करते
39:15हैं तो इसमें भी वर्जित होता है तो दोनों खंड देखा जाए तामसिक आध्यात्मिक और व्याज्यानिक खंड तो इसलिए इन
39:23सभी वस्तुम का प्रयोग नह
39:27तो वर्जितुमें जो दही हमको चाहिए वो स्वादू दही होनी चाहिए पूरी अच्छी जमी होनी चाहिए वो हमें नुकसान नहीं
39:34करती है लेकिन जो मंद दही होती है या अत्यामल दही जिसमें खटापन बहुत होता है वो इसमें हमें नुकसान
39:41करती है
39:44सावन में शिव भग कठोर संकल्प लेकर निकलते हैं
39:47ऐसे में वो स्वस्त रहे और अपनी धार्मिक यात्रा पूरी कर सकें
39:51इसको लेकर ही धार्मिक नियम बनाए गए हैं
39:54जिन में वैज्ञानिक दृष्टिकोन भी शामिल है
39:56इसलिए सावन महीने में स्वच्चता और सात्विक्ता पर अधिक जोर दिया गया है
40:07कावड यात्रा की नियम भी बहुत कठोर होते हैं
40:09इसमें नंगे पाउं चलने से लेकर कावड को जलाविशेक से पहले
40:14जमीन पर न रखने तक का संकल्प होता है
40:17समय के साथ साथ कई बातें बदल गए
40:19पर कावड का मतलब होता है अनुशासन
40:22इश्वर को पूर्ण तह समर्पन और सम्मान
40:39कावड यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं है
40:42बलकि सैयम, आस्था और अनुशासन की परीक्षा भी है
40:46इस यात्रा की पवित्रता बनाए रखने के लिए
40:49कुछ ऐसे नियमों का पालन बेहत जरूरी होता है
40:52जो इस धार्मिक यात्रा को अद्भुत बनाते हैं
40:58कावड यात्रा का सबसे बड़ा नियम है
41:01कि जमीन पर कावड नहीं रखी जाती
41:04किसी भी परिस्थिती में कावड को जमीन पर नहीं रखा जाएगा
41:09और ये अद्भुत मानिता सिर्फ परंपरा नहीं बलकि पवित्रता का प्रतीक है
41:13जब कावड यात्री विश्राम करते हैं
41:16तब कावड को किसी उचे स्थान पर ही रखा जाता है
41:19ताकि गंगा जल के पात्र अशुद्ध न हो
41:23एक संकल्प की सिध्धी है कि जिस तीर्थ के लिए कावड को उठाया गया
41:28और जहां उसको जाना है उस निमित मध्य में
41:51कावड यात्रा में नंगे पाउं चलना न किवल परंपरा है बलकि ये आत्म नियंत्रन और तपस्या का प्रतीक है
41:58यात्री गर्मी बारिश काटे और पत्रीले रास्तों के बावजूद बिना चपल जूते के चलते हैं
42:05ये दिखाता है कि भक्ति में सुवधा नहीं समर्पण आवश्यक है
42:12पूरी प्रत्री ही जिस स्थान में हम चल रहे हैं वो जल में है अर्था चंद्र में है वो शिव
42:18का ही साक्षा स्वरूप है
42:35कावण यात्री के लिए किसी भी तरे का नशा पूरी तरे से वर्जित है
42:39क्योंकि भगवान शिव की पूजा शुद्ध मन्ग और पवित्र आचरण से ही फली भूत मानी गई
42:47यह सभी जो उपक्रन है यह इंद्रियों को असंतुलित करते हैं तो हमारे पंच तत्व की जो समवेत इंद्री है
42:53वो इंद्री अगर असंतुलित है तो उपासना में एकागर चित्ता नहीं हो सकते
43:02कावड यात्रा का सबसे पवित्र तत्व लाया हुआ गंगा जल ही होता है
43:07गंगा जल को जलाबिशेग से पहले कहीं भी अनुचित स्थान पर नहीं रखना चाहिए
43:11क्योंकि कावड यात्रा का अंतिम लक्षे भगवान शिव पर पवित्र जल चढ़ाना ही है
43:19इसके अलावा कुछ और नियम है जैसे कावड यात्रा के बीच आप लगुशंका या शौच करते हैं
43:26तो गंगा जल से स्नान करके स्वैम को पवित्र करना होता है
43:29अगर कावड उठाने वाले व्यक्ति का स्वास्त्य बीच में खराब हो जाए
43:33तो कोई और भी उसकी जगे कावड उठा सकता है
43:41कावड यात्रा एक ऐसी अद्भूत यात्रा है जिसमें सहता शरीर है
43:45लेकिन परीक्षा आत्मिक विश्वास की हुरही होती है
43:49कावडियों का मानना है कि कावड वो ही उठाते हैं
43:52जिन्हें स्वयम शिव बुलाते हैं
43:55अद्भूत अविश्वस्निय अकल्पनिय में
43:57आज के लिए इतना ही देश और दुनिया की बाकी खबरों के लिए
44:00आप देखते रहिए आज तक
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