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ग़ज़ा में इज़रायल के नरसंहार के 1000 दिन पूरे हो चुके हैं। इस मौक़े पर 2 जुलाई को इंडो-पैलेस्टाइन सॉलिडेरिटी नेटवर्क (IPSN) ने दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में एक कार्यक्रम किया– हम नहीं भूलेंगे। कार्यक्रम में फ़िलिस्तीनी कवियों की कविताओं का पाठ भी किया गया। विनीत तिवारी से सुनिए फ़िलिस्तीनी कवि लिसा सुहैर मजाज़ की कविता।
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00:00क्रिस्टिनियन पोएटिस हैं लिसा सुहेर मजाज कविता थी
00:05वाट इट शी से क्या बोली वो उसने कहा ठीक है बाहर खेलो
00:11लेकिन बॉल फॉजीयों के पास मत फेकना जब कोई जीप वहां से गुजरे
00:17तो अपनी नजरें जमीन में गडाए रखना और पत्थर हर गिज मत उठाना
00:27लंगडी खेलने के लिए भी नहीं वो बोली की पड़ोसियों को बिलकुल परेशान मत करना
00:33उनके बेटे को कल रात ही वे गिरफतार करके ले गए गए गए
00:39परे टांग दो बिस्तर बना दो इसके पहले की सिपाही देख ले दीवार पर लिखा हर हर्फ हर चित्र मिटा
00:47दो
00:47वो बोली हमारे पास बिलकुल पैसे नहीं हैं अगर तुम्हारे जूते छोटे हो गए हैं तो अपने पैर काट कर
00:56उन्हें जूतों के नाप का बना ले
00:59हमारे पास खाने के लिए सिर्फ यही बचा है अब हम कल तक दोबारा कुछ भी नहीं खाएंगे
01:07नहीं हमारे पास संत्रे नहीं हैं उन्होंने संत्रों के सारे पेड़ काट डाले हैं
01:14क्यों, क्यों का तो मुझे नहीं पता, मुम्किन है संत्रे के पीड़ उनके टैंकों के लिए खत्रा हो
01:21मुझे नहीं पता कि हम कैसे जैतून की फसल लेंगे
01:25और मुझे ये भी नहीं पता कि हम क्या करेंगे
01:28अगर वो हमारे जैतून के पेड़ों को ही गिरा डालें तो
01:33खुदा देगा अगर वो चाहेगा
01:37या उनर्वा संयुक्त राष्ट संग की राहत एजेंसी कुछ दे दे तो दे दे
01:43लेकिन ये अमरीती हर्गिस नहीं देंगे
01:46उसने कहा तुम आज बाहर नहीं निकल सकते आज कर्फ्यू है
01:51उन खिर्टियों से दूर रहो तुम्हें क्या गोलियां चलने की आवाद सुनाई नहीं दे रही
01:56नहीं मुझे नहीं पता कि क्यों उन्होंने पडूसी का घर रहा दिया
02:00और अगर खुदा को पता है तो वो बता नहीं रहा
02:05सुनो, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाती हूँ
02:08उसे सुनकर तुम डरोगे नहीν
02:11कान या माकान
02:14अर्बी में बोलते हैं वन सपोना टाइम
02:17कान या माकान एक बार की बात है
02:21एक जगह थी या एक जगह जो नहीं थी
02:25उसका नाम फलस्तीन था
02:28जहां बच्चे खेला करते थे जलियों और मैदानों और बागीचों में
02:33और पेडों से तोड़ कर खूबानिया और बादाम खाया करते थे
02:37और अपनी माओं के लिए चमेली के फूलों की मालाएं गुथा करते थे
02:42और जब उनके सिरों के उपर से हवाई जहाज गुजड़ते थे
02:46तो वे खुश होकर किलगते थे और हाथ हिला कर टाटा तिया करते थे
02:52कान या मा कान एक बार की बात है अपना सिर नीचे जुकाये रखो
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