00:00कितनी देर लगी थी श्री राम को स्विकार करने में कि महल का और अयोध्या का त्याग करना है और
00:09भहुत नाटकी एक्षण था बस होने ही वाला था उनका राज दिलक
00:17उन्हें कोई फर्की नहीं पढ़ रहा था उनकी ताज बोशी है और तभी मन्थरा को कुछ वो बोलते ठीक तुम
00:25दे रहे थे सब भी ठीक था तुम नहीं दे रहे हो तब भी ठीक नहीं नहीं शादी करके लाए
00:33थे सीता बैठी हुई थी वालमी के रामान में व्यूरण आते ह
00:36कि बड़ी सुकुमारी थी उनको जाकर बोलते हैं कि मैं जा रहा हूं यहीं रहू हो जरूरत नहीं साथ आने
00:44की लेकिन इतनी नहीं बड़ी बात हो गई कि अपने स्वार्थ की खातेर इसको कहें कि अब तू भी चल
00:50लक्षमन खड़े हो गए हम भी उनको भी बोल रहे हैं त
01:07इतना सा इशारा कर देते दशरत ही कह देते मैं अपना वचन तोड़ता हूं दशरत ने भी बुलाया राम बोले
01:13आप क्यों दुखी हुए जा रहे हैं क्या बात है कुछ नहीं हो गया जा रहा हूं बड़ी से बड़ी
01:19बात हमारे लिए छोटी होनी चाहिए कुछ ऐसा नहो �
01:24जो बिचलित करते हैं जो अविच्यल रहे उसे ही आत्मा कहते हैं