00:00तड़प-तड़प की पिंजरे में वेबस पंची की भाती जो सब कुछ सह लेते हैं, वो कहते हैं मैं हूँ
00:07मुसहर।
00:08मुसहर वो समुदाय जो आज भी हाशिये पर खड़ा है।
00:12अपनी पहचान की लड़ाई लड़ रहा है, लेकिन इस लड़ाई की विपरीत एक तस्वीर वाराणसी में नजर आ रही है।
00:43दोना पतल बनाना हो या फिर चपल बनाना हो या अलग अलग तरीके के काम हो प्रसक्षन दे करके इन्हें
00:49आत्म निर्भर बनाया जा रहा है।
01:19लेकिन आज अपने हुनर से अपने होसले से दूसरों को प्रेणा दे रही है।
01:27हम दाले, मशीन आया और हम लोग काम करें। पहले ची दिदी बहुत अच्छा काम है। पहले बंधुआ मजूर नी
01:32रहते हैं अब खूल के रहते हैं।
01:35अब पहले तो सब लोग डारते थे, अब हम भी उनको डाट ले लगते हैं।
01:39हम नहीं अप डारते हैं।
01:40अब लोग बोलते हैं, पहले डाट सुन लेती थी माइलाई, अब डाट नहीं सुनते हैं।
01:45हम बोले कि हम अपने कामाय खाते हैं, नहीं हम अपने कामाया हैं।
01:55बोलता हैं।
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