00:04नमस्कार, मैं श्वेता दिवारी आप सभी का अभिनंदन करती हूँ, आईए आज आपको सुनाती हूँ राजस्थान पत्रिका के प्रधान सब्बादत,
00:12विद्या वाजस्पती गुलाप उठारी जी का, इस पंदन में प्रकाशित आलेक, जिसका शीवशप है, संकल्प से ही
00:19द्वन्द्व पर विजय, जीवन संसार की हवा के साथ ही भैता नहीं चला जाए, कुछ सार्थक और रचनात्मक कार्य करने
00:27का उतिश्य भी पूरा हो सके, इसके लिए दिशा चाहिए, अपनी शक्तियों को, सामर्थ्य को, समय को, धन को, एक
00:35ही दिशा में लगाने की आवश
00:38दिशाताय कर लेना, स्वयम से प्रतिग्या कर लेना, द्रिण निश्य कर लेना ही तो संकल्प है, सभी छोटे बड़े कार्यों
00:46के मूल में यह संकल्प दिखाई पड़ता है, संकल्प चाहे छोटा ही क्यों न हो, इसका प्रतिफल तो बड़ा ही
00:53होता है, छोटे से छोटा सं
01:00That's why, S सोरियास्त के साथ परिक्षा अनिवार्य होती ही है, इसे संकल्प की वास्थविक्ता का आभास हो पाता है।
01:07You may think that after eating food, you can eat a lot of good stuff.
01:13It is a very good idea.
01:16But the time you can eat, you can eat a lot of food.
01:23The food will be like 3-4 days, and you will not eat a lot of food.
01:30If you eat a lot of food, you will eat a lot of food.
01:34. . . .
02:11बनाने के लिए छोटे-छोटे संकल्पो के मध्यम से ही अभ्यास करना पड़ता है।
02:17ॐसे ही व्रिक्ष बनता है।
02:19संकल्प का अर्थ है द्वन्द्व पर विजय।
02:22जीवन एक संखर्ष है, द्वन्व पर आधारित संखर्ष है। आप अकेले बैठे रहें, तो भी आपके मन में अनेक विश्यों
02:31का द्वन्व चलता रहता है। यह द्वन्व ही आपकी व्यक्तित्व का निर्मान करता है। आप जितना समझ पाते हैं इन
02:39विचारों को, जितनी
02:40इस पश्चता विचारों में पैदा कर लेते हैं, उतना ही मन का द्वन्व घटता जाता है। अर्जुन युद्ध भूमी में
02:48न युद्ध से अर्धात युद्ध नहीं करूना कहकर अपने शस्त्र रण भूमी में नीचे रख देता है। उसके मन में
02:57द्वन्व उपस्थि
02:59यदि में विजयी हो गया तो ऐसी विजय का क्या लाग जो सभी संबंधियों के लक्त से रंजित विजय हो
03:07वह युद्ध भूमी में पहुँचकर भी युद्ध न करने के निर्ने पर अडिग रहता है तब टृष्ण कहते हैं कि
03:14सुख दुख आनी लाग जीवन मरन ये सब द्
03:29युद्ध नहीं करोगे तब भी यह मरन धर्मा है युद्ध न करने की स्थिती में तुम अपने ख्षत्रिय धर्म का
03:36अपमान करोगे अतह तुम युद्ध करके अपने ख्षत्रियत्व का सम्मान करो यही परम विजय है जीवन की सरलता का अर्थ
03:45भी यही है इसमें द्वन्
03:57We will be able to make a new life, and we will be able to make a new life.
04:28।
04:29।
04:53इसी के अनुरूप बना रहे, कई बार निमित बाकर मन फिसलने लग जाता है, हमें इस प्रकार के अवसरों को
05:01अंदेखा करना भी आना चाहिए, मन में एक बार छवी बन गई और आप यदि उस छवी पर अटक गए,
05:09तो आपकी पुद्धी और शरीर उसकी दिशा में ही कार्य
05:12करेंगे, अतह सबसे महत्वपूर्ण है, मन का संकल्प वान होना, संकल्प करने के साथ ही इंद्रियों के ग्राहिय विशय भी
05:22बदल जाते हैं, अनावश्यक विश्यों का आकर्षन स्वद्धह समाप्त हो जाता है, लक्षित दिशा में बढ़ने का साहस बढ़ता है,
05:32मनोब
05:32बढ़ता है, एक नई चेतना जागरत होती है, व्यक्ति के मन में उत्थान का आभास होता है, वह जीवन की
05:39सार्थरता अनुभव करता है, उसका संकल्प और भी द्रिड होता जाता है, किन्तु स्मरण रहे कि इस संकल्प का बाधक
05:49विकल्प सारे जीवन में सदा साथ रहता ह
05:52उस विकल्प को हटा कर संकल्प पर द्रिडता से आगे बढ़ते रहना ही, दुल्लभ मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलप्ती
06:02है, नमस्कार
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