00:00गणपती बप्पा मोरिया, आज से शुरू करते हैं 32 रूपों की गुप्त यात्रा, मुद्गल पुरान का असली ज्यान, मतलब बच्पन
00:09की बिलकुल कच्ची मासूमियत से लेकर, मोक्ष तक, पूरे 32 stages, दसवी शताबदी के एक रहसिमई तांत्रिक ग्रंथ में न,
00:17एक बह�
00:28पूरी तरह आजाद होने के लिए, यानि पूर्ण मुक्ती या मोक्ष तक पहुचने के लिए, 32 अलग-अलग मानसिक अवस्थाओं
00:36से गुजरना ही पड़ता है, और सबसे दिल्चस्प बात पता है क्या है, ये 32 अवस्थाएं कोई, कोई philosophical आइडिया
00:43या अमूर्त विचार
00:44नहीं है, ये साक्षाद भगवान गणेश के 32 अलग-अलग रूप हैं, मतलब आज की इस गहरी चर्चा में हम
00:51इसी गुप्त ग्यान को डिकोड करने वाले हैं, ये इनसान की चेतना के विकास का एक ऐसा मैप है न,
00:56जो सोचने का नजरिया पूरी तरह से बदल कर रख देता ह
00:59और दिखी इस विशे का सबसे बड़ा आकर्शन यही है कि ये ज्यान सद्यों तक बहुत ही सीमत लोगों के
01:06बीच रहा, जब हम इस डीप डाइफ के लिए रिसर्च कर रहे थे न, तो हमने मुख्य रूप से तीन
01:11बहुत ही मजबूत सोर्सिस को खंगाला, सबसे पहले तो व
01:29मतलब हर श्लोक एक खास मानसिक स्थिती को जागरत करने का विज्ञान है, ये सिर्फ मूर्तियों की बात नहीं करता,
01:36ये तो इनसान के भीटर चलने वाले मनोविज्ञानिक विकास की बात करता है
01:40और इस ज्यान को सिर्फ शब्दों तकी सीमित नहीं रखा गया, हमारे पास जो दूसरा सुरोथ है, वो विज्वल्स के
01:47लिहाज से एक अनमोल खजाना है
01:50उनिसफी शताबदी में मैसूर के राजाओं के सनरक्षन में एक अदभुत चित्रकला तयार की गई थी, जिसे श्री तत्व निधी
01:56कहा जाता है
01:57हाँ, और श्री तत्व निधी की सबसे सासपत यह है कि मुदगल पुराण में जो श्लोक संस्कृत में लिखे गया
02:03है न, ये पेंटिंग्स उनका बिलकुल सटीक और सजीव चितरन करती है
02:08मतलब उन चित्रों में रंगों का चुनाव, हत्यारों की संख्या, बैठने की मुद्रा, सब कुछ इतनी बारीकी से बनाया गया
02:17है कि लगता है जैसे वो श्लोक पन्नों से बाहर आ गया हूँ
02:20क्या बात है, और इसके साथ ही हमारा तीसरा श्रोध भी है, गणपती अथरवशीर्श, ये उपनिशत बहुत ही सपष्ट रूप
02:28से स्थापित करता है कि गणपती कोई और नहीं, बलकि साक्षात ओम है, मतलब प्रणव कही साकार रूप है
02:34ये ओम वाली बात समझना यहां बहुत जरूरी है, देखे, ओम पूरे ब्रहमांड की गूंज है न, वह मूल ध्वनी
02:42है जिससे सब कुछ पहदा हुआ, तो जब मुदगल पुराण 32 रूपों की बात कर रहा है, तो असल में
02:47वो उसी एक ब्रहमांडिय ध्वनी के 32 अलग-अ
02:51अलग स्पंदनों का या वाइब्रेशन का वैज्ञानिक खाका खीच रहा है, अच्छा, तो मतलब ये अलग-अलग देवताओं की बात
02:58नहीं है, बिलकुल नहीं, ये एक ही परमचेतना के 32 अलग-अलग dimensions है, तो अगर इस पूरी बात को
03:05हम एक आसान तुलना से समझें, तो
03:07इन 32 रूपों को मंदिरों में सजी अलग-अलग मूर्तियां भर नहीं मानना चाहिए, इन्हें इनसान की आत्मा के आंत्रिक
03:13विकास का एक एक रोड मैप समझना चाहिए, जो जीवन की एकदम शुरुवाती अवस्था से शुरू होता है, हाँ, एक
03:21बच्चे की मासूमियत स
03:23लेकर पूर्ण मुक्ती तक, ये एक जीती-जागती मनो-विज्ञानिक यात्रा है, और इस यात्रा की शुरुवात होती है पहले
03:31रूप से जिसे बाल-गनेश-पती कहा जाता है, बाल-गनेश-पती, नाम से ही मासूमियत जलगती है, बिलकुल, पुराणों
03:40के अनुसार य
03:42और इनके हाथों में फल होते हैं, यहां समझने वाली बात ये है, कि लाल-गनेश-पती को इनसान के
04:02मूल-धार चक्र से जोड़ा गया है, मूल-धार यानि रीड की हड़ी का सबसे निचला हिस्सा, जो इनसान के
04:09अस्तित्व की नीव है, और आत्मा की यात्रा है,
04:15और इसी सोर्स में एक बहुत ही रोचक कहानी का भी जिकराता है, एक मी संतान व्यक्ति था, जिसके पास
04:22चढ़ाने के लिए कोई बहुत कीमती चीजें या सोने चांदी के अभूशन नहीं थे, उसके पास सिर्फ कुछ केले थे,
04:29हां, केले दुनिया का सबसे आसानी से मिलने
04:31और सस्ता फल है, इक्जाक्ली, तो उसने पूरी मासूमियत और बिना किसी भारी अनुष्ठान के वो केले बाल गंडपती को
04:40अर्पित कर दिये, और इसकी इस शुद्ध भावना से प्रसन होकर बाल रूप ने उसे पुत्र प्राप्ती का आशिरवाद दिया,
04:47मतलब इसका म
05:16अनुवज्ञानिक पहलू कितना गहरा है?
05:19तो मासूमियत की जगा यौवन और उर्जा ले लेती है, शरीर और मन नई चीजों को आजमाना चाहते हैं, और
05:27यही पर इस रोड मैप का दूसरा पड़ावाता है तरून गणपती
05:31तरून का तो मतलब ही होता है युवा या नौजवान?
05:34हाँ, यह रूप भी लाल रंका है, लेकिन यह बचपन की नहीं, बलकि यौवन चुस असीम और उफनती हुई उर्जा
05:42का प्रतीक है, इस रूप के हाथों में ताजे बेर होते हैं, जो जीवन के रस और नई पन को
05:48दर्शाते हैं
05:54हाँ, उन्होंने तरुण रूप का ध्यान किया और अपना यौवन वापस पा लिया
06:19बिल्कुल सटीक है, ये चेतना का वो स्तर है, जहां इनसान के भीतर कुछ नया करने की आग होती है,
06:26लेकिन देखिए, जब ये युवा उर्जा अपने चरम पर पहुँचती है, तो उसका टकराव दुनिया से होता है, जीवन में
06:34चुनौतियां आती है, हाँ, संघर्ष श�
06:39सामना करने के लिए सिर्फ उर्जा काफी नहीं है, साहस और नियंत्रन चाहिए, उर्जा को दिशा देने की जरूरत पड़ती
06:47है, यहीं से प्रगट होते है वीर गणपाती, ये सोला भुजाओं वाले एक वीर योद्धा का स्वरूप है, जिनके हर
06:55हाथ में अलग-अलग अ
07:09सही सवाल है, आज के इंसान की सबसे बड़ी लडाईयां तो उसके दिमाग के अंदर होती हैं, तनाओ, चिंता, भविश्य
07:16का डर, अतीत का पच्चतावा, तो एक योद्धा की बजाए, क्या ये उन मानसिक उल्जनों को सुलजाने का प्रतीक हो
07:24सकता है?
07:24मैं आपको बताती हूँ, प्राचीन रिश्यों का मनो विज्ञान आज के विज्ञान से बहुत मेल खाता है, तांत्रिक ग्रंत शारीरक
07:33लडाई की बात करते ही नहीं है, देखिए, इंसान का ध्यान प्राकृतिक रूप से सोला अलग-अलग दिशाओं में भटकता
07:40है, अच
07:56अरे बा, ये तो मैंने सोचा ही नहीं था, हाँ, जब कोई ये सोला भुजाओं वाले रूप का ध्यान करता
08:02है, तो असल में वह अपने उस मल्टी टास्किंग दिमाग को अनुशासन में ला रहा होता है, जो हर दिशा
08:09से आ रही परिशानियों में उल्जा है, अस्त्र शस्त
08:12उन मनो विज्ञानिक उपकरणों के प्रतीक हैं, जो इनसान के भीतर के अंधकार को काटते हैं, तसे ये बिल्कुल साफ
08:20हो जाता है, कि वीर रूप असल में क्यों इतना जरूरी है, जब इनसान अपने भीतर के इन भटकाओं को
08:26नियंतरित कर लेता है, अपनी मानसिक लडा
08:42प्रवेश करता है, मासूमियत और संघर्ष का दौल खत्म अब ग्यान और सफलता का दौर शुरू होता है, इस दूसरे
08:50पड़ाव में चेतना बहुत ही व्यवहारिक हो जाती है, मतलब यह उन रूपों का समय है, जो रोजमर्रा की सफलताओं
08:56और ग्यान से जुड़े हैं, ह
09:11राचीन दर्षन में पहला ज़न्म शारीरिक माना जाता है, जो माता पिता देते हैं, लेकिन दूसरा ज़न्म तब होता है,
09:18जब इंसान घ्यान प्राक्त करता है, जब पुद्धी का विकास होता है, इस एकजाट्ली, शिक्षा इंसान के सोचने का नजरिया
09:25पूरी तरह से �
10:25ुश्या से उसका wishlation करता है।
10:31जब कोई बड़ी परीक्षा हो या जीवन का कोई महत्वपूर्ण लक्ष हो तो चेतना का यह स्वरूप इंसान को हार
10:38न मानने की शक्ती देता है।
10:56इसी स्थिती से निपटने के लिए ही इसी पड़ाव में विगन गणपती का रूप आता है।
11:02ये भी सुनेहरे रंग का स्वरूप है जिसकी आठ भुजाएं है।
11:06सुरोत में एक बहुत ही अद्भुत कथा है जहां एक पूरे गाउं पर भयंकर बाड का खत्रा मंडरा रहा था।
11:16विगन गणपती का स्वरूप इनसान के दिमाग के चारों और एक मनोविग्यानिक शील्ड या धाल बनाने का काम करता है।
11:43जो बाहरी संकटों के बीच भी मन को स्थिर रखता है और यहां एक बहुत बड़ा दाशनिक निशकर्ष सामने आता
11:49है।
11:50इस रोड मैप में कोई भी अवस्था अकेले काम नहीं करती।
11:54समरपण यानि भक्ति गणपती, एक्शन यानि वीर गणपती और ग्यान यानि द्विज गणपती ये तीनों आपस में गहराई से जुड़े
12:03हैं।
12:04सिर्फ भक्ती से, सिर्फ महनत से या सिर्फ ग्यान से कोई इंसान पूर्णता तक नहीं पहुँच सकता।
12:10संतुलन ही असली चाबी है।
12:12क्या बात है।
12:13ये सारी बाते सुनने में भले ही प्राचीन लगें, लेकिन आज के modern जीवन में इनका बहुती सीधा इस्तमाल हो
12:20रहा है।
12:20वास्तु शास्त्र में आज भी उर्जा को संतुलित करने के लिए इन खास रूपों की मदद ली जाती है।
12:50चेतना को साधने के लिए कितने सटीक टूल्स बनाये थे। और यही उप्योगिता ही इस ग्रंत को अमर बनाती है।
12:57लेकिन इनसान ने दुनिया की सफलता पाली, ग्यान पालिया, रोकावटों को भी पार कर लिया। तो अब इसके बाद क्या।
13:04इनसान की आत्मा तो यही नहीं रुकती ना।
13:10तब इनसान असली आजादी की तलाश करता है और यहीं से ये रोड मैप अपने सबसे रहस्य मई, जटल और
13:18तीसरे आखरी पड़ाओं में प्रवेश करता है तांत्रिक रहस्य और पूर्ण मुक्ती।
13:23यह इस पूरी चर्चा का सबसे गहरा और मैं कहूंगा रॉंग्टे खड़े कर देने वाला हिस्सा है।
13:32यह कोई आम स्वरूप नहीं है, नीले रंग का यह रूप पूरी तरह से तांत्रिक मार्क से जड़ा हुआ है
13:39और इसका सीधा कनेक्शन हमारे सहस्रार चक्र से है।
13:42यानि सिर का सबसे उपरी हिस्सा जो परम चेतना का द्वार माना जाता है।
13:48अब तंत्र शब सुनते ही अक्सर लोग दर जाते हैं या इसे काले जादू से जोड लेते हैं। लेकिन इस
13:53ग्रंथ में तंत्र का अर्थ काला जादू नहीं है। तंत्र असल में चेतना को विस्तार देने की एक बेहद साइंटिफिक
14:00तक्नीक है।
14:00बिलकुल और उचिस्ट का शाब्दिक अर्थ ही समाज की माननेताओं पर एक बहुत बड़ा प्रहार है। उचिस्ट का मतलब होता
14:07है जूठा यानि लेफ्ट ओवर्जू इसकी जो कहानी स्त्रोत में दी गई है वो वाकई आखे खूलने वाली है। एक
14:15ऐसा व्यक्ति था ज
14:29चरम भक्ती में उसने अपना जूठा भोजन ही उचिस्ट गणपती को अर्पित कर दिया। और इस तांतरिक रूप ने उस
14:36जूठे भोजन को बिला किसी संकोच भेदभाव के स्विकार कर लिया। और एकमा ही नहीं उस व्यक्ति को अश्ट सिध्यां
14:42प्रदान की। अब अ
15:00अक्सर लोग मानते हैं कि दुनिया छोड़कर पहड़ों पर चले जाना मुक्ति है। लेकिन उचिष्ट रूप सिखाता है कि समाजिक
15:06भेदभाव, छुआ छूट, अमीर गरीब और समाज के बनाए गए शुद्ध अशुद्ध के खोकले नियामों से पूरी तरह उपर उ�
15:26पढ़ाओं में एक और बहुत ही अद्भुत रूप सामने आता है जो नेपाल में बहुत पॉपुलर है हिरंब गनपती। इस
15:33रूप के पांच चहरे हैं लेकिन सबसे हरान करने वाली बात ये है कि ये रूप चुहे पे नहीं बलके
15:40एक शेर पर सवार है। हिरंब गनपती क
15:55जब कोई मुक्ती के करीब पहुँचता है तो वो अपने भीतर के सबसे बड़े डर को ही अपना वहान बना
16:01लेता है। डर पर सवारी करना ही हरंभ रूप का संदेश है। और अगर हम इस पूरे ग्रंथ के गनित
16:08पर ध्यान दें। हाँ ये सवाल में पूछ नहीं वाला था
16:25यानि परम चेतना के माने गए हैं और सोला अंच प्रकृती यानि भौतिक संसार के। तो जब इंसान के भीतर
16:34चेतना और भौतिक दुनिया का एक बिलकुल परफेक्ट और पूर्ण संतुलन स्थापित हो जाता है तब 32 का ये आंकड़ा
16:41पूरा होता है। ये आंक संपूर्
17:21की तरह पेश किया है। हाँ, बिलकुल।
17:24पुरान भी इससे कोई वनवे स्ट्रीट या सीधी रेखा नहीं मानता। मानवचेतना का विकास एक चक्र है, एक स्पाइरल है।
17:32जीवन की हर घटना के साथ ये चक्र घूमता है।
17:36मतलब इनसान वापस भी जा सकता है। बिलकुल।
17:54है ना, एक व्यक्ती दफ्तर की चनौतियों से निपटते समय वीर हो सकता है, घर आकर अपने बच्चों के साथ
18:01बाल हो सकता है, और एकांत में अपनी सोच में उच्छिष्ट हो सकता है। ये परिस्थितियों के अनुसार चेतना को
18:09ढालने का विज्ञान है।
18:11तो इस पूरी आत्मिक यात्रा और इसके पीछे के मनोविज्ञान को समझने के बाद अब वक्त है इसे समेटने का।
18:17मुदगल पुराण के अनुसार इन 32 रूपों का सिर्फ बौधिक ज्ञान हासिल कर लेना ही काफी नहीं है। असली बदलाव
18:24तो इनके अभ्यास से आता ह
18:38माना जाता है कि इस जाप से इनसान को अश्ट सिधियां प्राप्त होती है। और अश्ट सिधी जैसा हमने पहले
18:45समझा अपने विचारों और अपनी परिस्तितियों पर असीम नियंतरन पा लेना है। जब कोई इस नाम माला का जाप करता
18:52है तो वो असल में अपने सबकॉं�
18:54को उन 32 अलग अलग अवस्थाओं से परिचित करा रहा होता है। बिलकुल ये एक पूरा विग्ननाश तंत्र है जो
19:02मानसिक और भोतिक रुकावटों को जड़ से खत्म करने की शमता रखता है। तो सुनने वालों को इस प्राचीन ध्वनी
19:09और इसकी उर्जा का एसास कराने
19:10के लिए आये इस नाममाला का एक छोटा सा डेमो सुनते हैं। बस एक पल के लिए अपनी रोजमर्रा की
19:17उलजोनों को भूल कर इस ध्वनी के भीतर छिपे विज्ञान और शांती को मैसूस करने की कोशिश कीजिए। ओम बाल
19:23गन पते नमा, ओम तरुन गन पते नमा, ओम भक
20:05परिक्षन करना चाहिए।
20:13जीवन की हर परिस्थिती को सुलजाने के लिए चेतना का एक खास रूप पहले से ही हमारे भीतर है, बस
20:20असे पहचानने की जरूरत है।
20:41हम ने देखा कि आत्मा की यात्रा कितनी जटिल और कई परतो वाली है, ये सिर्फ भगवान की पूजा नहीं
20:48है, ये खुद को जानने का एक पूरा विज्ञान है।
20:51इसलिए जाते जाते एक ऐसा विचार छोड़ना जरूरी है, जो सोचने पर मजबूर कर दे।
21:22हम बिल्कुल।
21:25इस गहरे सवाल के साथ आज की ये चर्चा यहीं समाप्त होती है।
21:28फिर मिलेंगे ग्यान के किसी नए श्रोत और एक नई गहरी चर्चा के साथ।
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