Skip to playerSkip to main content
  • 4 months ago
अक्षय तृतीया से शादी का सीजन शुरू हो जाता है, लेकिन अब धीरे-धीरे पारंपरिक बाजे का बाजार सिमटता जा रहा है. प्रशांत सिंह की रिपोर्ट.

Category

🗞
News
Transcript
00:28
00:40अलग अलग वादियंत्रों को लेकर ये कलाकार 36 गड़ाएं है।
01:12गाँ गाँ में अब दीजे और गाजा बाजा उपलब होने के चलते इन कलाकारों की डिमांड कम हो गई है।
01:18लेकिन पुर्खों से मिली व्यासर को न सिर्वे संभाल रहे हैं बलकि उनका कहना है कि इन वाजों की गूंज
01:23सुनकर नहीं नाच्टे वालों के भी पैर धिरक जाते हैं।
01:35आपको दिल धरक जाता है। जितने भी नचनिया मन भी धरक जाता है। उसका दिल भी दूसर हो जाता है।
01:42नहीं नचया भी नासता है। उसका पैर पढ़ जाता है।
01:49चले भापको पुराने वादियंत्रों के बारे में बताते हैं। यह है ढोल, इसे आपने देखा ही होगा। इसका निमान खोकली
01:56लकडी सिखिया जाता है। और दोनों छोर में चम्रे को मजबूती से कस दिया जाता है। इसे बजाने के लिए
02:02दोनों हात में लकडी का डंड
02:18करता है। इसे बजाने के लिए चम्रे के ही दो स्टिक का उप्योग होता है। कभी-कभी इसे कलाकार हात
02:24की कुहने से भी बजाते हैं। इसी तरह है यह मोरी। मूँ से फूक मरकर अलग-लग धुन इससे निकाली
02:32जाती है। मूल रूप से इसी वादियंत्र से यह ग्रूप
02:58जुर्ग लोग इश्वर की देन मानते हैं।
03:18बुकिंग होती है और यह चल पड़ते हैं लोगों को नचाने के लिए।
Comments

Recommended