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  • 1 hour ago

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Transcript
00:00विश्व भी लडखडा रहा है।
00:05हम देखते हैं, बहुत ज़्यादा बोलने की आवश्यक्ता नहीं, सारी परिस्थिती हमारे सामने हैं।
00:13युद्धो होते हैं।
00:15युद्धो क्यों हो रहे हैं, तो स्वार्था है, और कुछ नहीं है।
00:21आधिपत्य का कलह है, वर्चस्व का कलह है।
00:25स्वार्था के लिए ये चाहिए, वो चाहिए, मेरे बहां नहीं है, इसलिए वहां से लाओंगा।
00:31इसलिए वहां वर्चस्व चाहिए। ऐसे सारी ही होता है।
00:37तो मूल में ये स्वार्था परवड़ती है।
00:42क्योंकि अगर हम यह माने कि दुनिया केवल जड़ है, कणों से बनी है, तो कणों का तो संबंध नहीं
00:51होता है।
00:55संबंध नहीं है, तो हम सब अलग-अलग है, अलग-अलग है तो हमारा अपना स्वार्था पहला नंबर है।
01:04और इसलिए इन प्रश्णों के उत्तर ढूंडने का प्रयास दो हजार वर्ष दुनिया ने किया पिछले।
01:14और तरह-तरह के प्रयोक किये। लेकिन न कलह बंद हो गये, न कट्टरपन के चलते एक दूसरे को बदलने
01:24का प्रयास करना, कनवर्शन करना ये बंद हुआ।
01:28आपस के कट्टरपन में एक दूसरे को ऊच नीच मानना, ये बंद हुआ।
01:33सारी समस्याएं जो की तो आज भी खड़ी है।
01:37और दुनिया देख रही कि हमने जो प्रयास किये, उसमें कुछ तो अच्छा हुआ होगा।
01:43लेकिन उससे ज्यादा बहुत खराब हुआ है।
01:47और दुनिया आज विनाश्क के कगार पर जा रही ऐसा लग रहा है सब।
01:54और इसका उपाय दूसरा कुछ नहीं है क्योंकि मूल में धारना ही गलत है।
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