00:00ये दादी सिर्फ पत्तों से ऐसा चेहरा बना देगी आपने कभी देखा नहीं होगा
00:05गाहां की शांत दोपहर थी चारो तरह मिट्टी की खुशबूर हवा में हिलते नारियल के पेड एक बजूर्ग दादी जमीन
00:13पर बैठी थी
00:13उनके हाथों में कुछ हड़े बरे पत्ते थे कोई नहीं जानता तो वो क्या बनाने वाली है
00:18दादी दीरे दीरे उन पत्तों को बुनने लगी उनकी उंगली इतनी तेह चल दी थी जैसे सालों का अनुवव हर
00:25हरकत में जलक रहा हो
00:27कुछ ही देर में एक साधारन पत्तों का डेर बदलने लगा और फिर अचानक एक बिशाल चेहरा त्यार हो गया
00:34ऐसा लगा जैसे पत्तों में जान आगी हो
00:37उस चेहरे की आँखे नाक और खुला हुआ मूद सब कुछ इतना असली लग रहा था कि गाओं के लोग
00:44हैरान रहेगे क्योंकि जे सिर्फ कला नहीं थी जे दादी की जिन्दकी भर की मेहनत और हुनर का जादू था
00:51असली कला उमर नहीं देखती बस दिल और अनुबब से बनत
00:55जादी है
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