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यह वीडियो भारत–अमेरिका के बीच हुए $500 अरब (करीब 42 लाख करोड़ रुपये) के अंतरिम व्यापार समझौते की सच्चाई और रणनीति को आसान भाषा में समझाता है। पहली नज़र में यह डील भारत पर भारी खर्च का दबाव लगती है, लेकिन हकीकत इससे अलग है। भारत ने कोई अतिरिक्त खरीद नहीं की, बल्कि अपनी भविष्य की जरूरतों—तेल, एविएशन, AI, डेटा सेंटर्स और न्यूक्लियर एनर्जी—को अमेरिका की ओर शिफ्ट किया है।

वीडियो बताता है कि कैसे पेट्रोलियम, बोइंग विमानों, AI इंफ्रास्ट्रक्चर और न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी में यह डील भारत की ग्रोथ को सपोर्ट करती है। साथ ही यह भी साफ किया गया है कि डेयरी और मुख्य अनाज जैसे संवेदनशील सेक्टर पूरी तरह सुरक्षित हैं, यानी भारतीय किसानों को कोई नुकसान नहीं। उल्टा, भारतीय मसाले, चाय, कॉफी और फार्मा को अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी।
यह डील खर्च नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक भविष्य की मजबूत नींव है।

This video explains the reality and strategy behind the $500 billion (around ₹42 lakh crore) interim trade agreement between India and the United States in simple terms. At first glance, the deal appears to put heavy financial pressure on India, but the reality is very different. India has not committed to any extra or unnecessary purchases; instead, it has redirected its future requirements—including oil, aviation, AI, data centers, and nuclear energy—towards the US.

The video highlights how this agreement supports India’s long-term growth through investments in petroleum imports, Boeing aircraft, AI infrastructure, and advanced nuclear technology. It also clearly addresses concerns related to farmers by confirming that sensitive sectors like dairy and staple grains are completely excluded, ensuring zero risk to Indian agriculture. On the contrary, the deal opens wider access to the US market for Indian products such as spices, tea, coffee, and pharmaceuticals.

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Transcript
00:00क्या भारत वाकई पांच सालों में 42 लाख करोड रुपे खर्च कर सकता है?
00:05और वो भी सिर्फ अमेरिका से इंपोर्ट करने में.
00:08और अगर हां, तो सवाल बस ये नहीं कि पैसे कहां से आएंगे.
00:12सवाल ये भी है कि इतना सारा सामान आखिर जाएगा कहां?
00:16एक ऐसी ट्रेड डील जिसने सियासत, अर्थ, शास्त्र और किसानों से लेकर टेक इंडस्ट्री तक हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है.
00:24भारत और अमेरिका के बीच हुए इस अंतरिम व्यापार समझोते में सबसे बड़ा आंकड़ा है 500 अरब डॉलर, यानि करीब 42 लाक करोड रुपे.
00:34डील के मुताबिक भारत अगले 5 सालों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर का सामान खरीदेगा, यानि हर साल करीब 100 अरब डॉलर.
00:42सुनने में ये बहुत बड़ा दबाव लगता है, लेकिन क्या ये सच में कोई मजबूरी है, या फिर भारत का सोच समझ कर खेला गया रण नीतिक दाव?
00:51सबसे पहले एक जरूरी फैक्ट, भारत का कुल सालाना आयात बिल है करीब 720 अरब डॉलर, यानि भारत पहले से ही दुनिया से भारी मात्रा में आयात करता है.
01:03अब सवाल ये है कि क्या भारत ने कुछ अतिरिक्त खरीदने का वादा किया है? जवाब है नहीं. भारत ने सिर्फ अपनी भविश्य की जरूरतों को अमेरिका की तरफ मोड दिया है. और ये जरूरते तीन बड़े सेक्टरों में बटी हैं. पहला सेक्टर पेट्रोलियम औ
01:33भारत को खरीदना ही था, बस सप्लायर बदला है. दूसरा सेक्टर एरक्राफ्ट और एविएशन. भारत की एलाइन्स को साल 2022 तक करीब 2200 नए विमानों की जरूरत है. यानि हर साल ओसतन 150 नए विमान. अगर इसमें से बोईंग को बड़ा हिस्सा मिलता है, तो सिर्फ एव
02:03AI और डेटा सेंटर्स. केंद्रिय मंत्री अश्विनी वैशनव के मुताबिक भारत में AI इंफ्रस्ट्रक्चर पर 200 अरब डॉलर का निवेश होना है. एन्विडिया और माइक्रोसोफ जैसी अमेरिकी टेक कंपनियों के साथ जॉइंट वेंचर्स के जरिए हर साल करीब 50 अर
02:33पियूश गोयल ने साफ कहा है डैरी और मुख्य अनाज जैसे सेंसिटिव सेक्टर इस डील से पूरी तरह बाहर हैं. अमेरिका से आयात होगा पशु आहार यानि DDG, रेड सोरगम, बादाम और कुछ नट्स. ये वो फसले नहीं है जो भारतिये किसान बड़े पैमाने परो
03:03क्लीन एनेजी की ओर बढ़ रहा है. अमेरिका में पारित शान्ती आक्ट के बाद भारत के नुक्लियर सेक्टर में अमेरिकी निवेश का रास्ता साफ हुआ है. स्मॉल मॉडियर रियाक्टर्ज और नुक्लियर मशीनरी का करीब 60 अरब डॉलर सालाना बाजार अब अमेरिक
03:33खरीदने का वादा किया है जो उसे वैसे भी खरीदना था. फाइदा ये हुआ कि बदले में टेक्स्टाइल, जेम्स इन जूलरी, फामा इंसेक्टरों में अमेरिका में कम टारिफ मिलेगा. यानि भारतिय सामान एशियाई देशों से सस्ता बिकेगा. 500 अरब डॉलर की ये
04:03आप देखते रहे वन इंडिया हिंदी.
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