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बिहार के पूर्णिया जिले से आई ये कहानी ना किसी बड़ी कंपनी की है, ना किसी करोड़ों के स्टार्टअप की।ये कहानी है एक साधारण मैकेनिक की, जिसने अपने छोटे से गैराज में गांव की सबसे बड़ी जरूरत का एक सस्ता और देसी समाधान तैयार कर दिया। पूर्णिया के रहने वाले मुरशिद आलम कोई बड़े इंजीनियर नहीं हैं। वह एक आम मैकेनिक हैं, जो सालों से गाड़ियों की मरम्मत का काम करते रहे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कई गैराज में काम किया, फिर अपने शहर लौटकर खुद की एक छोटी-सी वर्कशॉप खोल ली।

This inspiring story comes from Purnia district of Bihar — not from a big company or a billion-dollar startup, but from a small garage.Murshid Alam, a simple mechanic with years of experience repairing vehicles, identified a major problem faced by farmers and small traders in rural India: the lack of affordable transport. Diesel and petrol are expensive, maintenance is difficult, and most electric vehicles are far beyond the reach of villagers.


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~HT.178~ED.104~

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00:00विहार के पुर्णिया जुले से आई ये कहानी ना किसी बड़ी कंपनी की है, ना किसी करोडों के स्टार्ट अप की
00:12ये कहानी है एक साधारण मेकानिक की जिसने अपने छोटे से गराज में गाउं की सबसे बड़ी जरूरत का एक सस्ता और देसी समाधान तयार कर लिया
00:21पुर्णिया के रहने वाले मुर्शिद आलम कोई बड़े इंजिनियर नहीं है
00:25वो एक आम मेकानिक है जो सालों से गाड़ियों की मरमत का काम करते रहे
00:29पड़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कई गराज में काम किया
00:33फिर अपने शहर लोट कर खुद की एक छोटी सी वरक्शॉप खुल ली
00:36धीरे-धीरे मेहनत प्रंग लाई और परिवार का खर्च चलने लगा
00:40काम करते हुए मुर्शिद ने एक बात बार-बार महसूस की
00:43कि गाउं के किसानों और छोटे व्यापारियों के पास ऐसा कोई सस्ता वहान नहीं है
00:48जो रोज मर्रा के सफर के साथ खेती के काम में भी आ सके
00:51डीजल और पेट्रोल महंगा है, मेंटिनेंस मुश्किल है
00:54और बाजार में मौजुद इलेक्ट्रिक वहान गाउं वालों की पहुच से बिलकुल बहार है
00:59यहां से मुर्शिद के वन में एक सवाल उठा, क्यों ना गाउं के हिसाब से एक देसी इलेक्ट्रिक जीब बनाई जाए
01:05ऐसे जीब जो सस्ती हो, चलने में आसान हो और किसान की जरुरतों को पूरा करे
01:15यही सोच आगे चलकर एक बड़े प्रयोग में बदल गई
01:18बिना किसी बड़ी टीम के, बिना किसी बड़ी मशीन के
01:22मुर्शिद आलम ने सिर्फ 18 दिनों में एक 5 सीटर इलेक्ट्रिक जीब तयार कर ली
01:27इस जीब में अलग सी ट्रॉली जोडने की सुविदा है, जिससे किसान फसल, खाद और सामान धो सकते है
01:38एक बार फुल चार्ज होने पर इलेक्ट्रिक जीब करीब करीब 100 किलो मेटर तक चलती है
01:43इसे चार्ज होने में लगबग 5 घंटे लगते हैं
01:46करीब एक लाख रुपे की लागत में बनी इस जीब में मेंचर पहिए ट्यूबलस टायर, स्पीडो मेंटर, चार्जिंग पॉइंट और पावर स्टेरिंग जैसे जरूरी फीचर्स मौजूद है
01:59खास बात ये है कि इसे चलाना बहुत आसान है
02:02कम अनुपव वाले ड्राइवर भी इसे जीब को आसानी से चला सकते है
02:06यही वज़ा है कि गाउं के लोग इसे एक उप्योगी और सस्ता विकल्प मान रहे है
02:10जब देश एलेक्रिक बदलाव की बात कर रहा है
02:13तब मुर्शिद आलम की एक कोशिच बताती है कि नवचार सिर्फ शेहरों की लैब में नहीं
02:17बल्कि गाउं के छोटे गराज में भी जन्म लेता है
02:20कम साधन लेकिन बड़ी सोच
02:22यही असली आत्मिर्बर भारत की तस्वीर है
02:24मुर्शिद आलम की एलेक्रिक जीप सिर्फ एक वहन नहीं है
02:28बल्कि यह उस सोच की मिसाल है जो जमीन से जुड़ी है
02:31और लोगों की असली जरुरतों को समझती है
02:34पुर्णिया से एक मेकनिक की एक कहानी आज पूरे देश के लिए एक सीख बन कर सामने आई है
02:54पुल्ट है
02:56झालोग एक अबने आप अबने घए लिए ऑ्नाप पन्ने आप जह पूरे जातने है
03:01झालोगों की एक मेका की एक जातने है
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