00:00सकंद पुराण में वर्नन मिलता है कि सब्त रिशियों में एक रिशी महर्शी अगस्त्य वारानसी के गोदौलिया के पास अगस्त्य कुंठ शेत्र में अगस्तेश्वर महादेव का मंदिर है
00:19यह वही स्थान है जहां रिशी अगस्त्य ने घोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसंद करने का काम किया था भगवान शिव प्रशन होकर दर्शन दिया था और वही स्वयंगु शिवलिंग के नाम पर स्थापित हो गये जिसे अगस्तेश्वर महादेव के नाम से जाना ग
00:49प्रसार करने का निर्देश रिशी अगस्थ्य को दिया महर्शी अगस्थ्य ने तमिल को व्याकरन रचना एवं प्रचार प्रसार किया इसलिए उन्हें तमिल भाशा के जनक के रूप में माना जाता है इसके पीछे मान्यता है कि जब वे दक्षन भारत आए तो वहां के लो�
01:19यहां पर समुद्र देव रक्षा करते हुए दिखाई दे रहे हैं मंदिर परिसर में अगस्थ्य रिशी के पत्नी लोपा मुद्रा अगस्थ्य रिशी नौग्रह हनुमान जी समुद्र देव सहित अन्य प्रतिमाय है महा भारत के अनुसार जब असुरों ने समुद्र में �
01:49अवसर दिया रामायन में जब भगवान राम लंका युद्ध के लिए जा रहे थे तब अगस्थ्य मुनी ने उन्हें आदित्य हृदय स्तोत्र प्रदान किया जिससे उन्हें शक्ती प्राप्थ हुई और वे रावन को पराजित कर सके विंध्य परवत को जुकने का आदे
02:19उसने सूर्य के मार्क को रोक दिया, सभी देवता और रिशी इस समस्या को हल करने के लिए अगस्थ्य मुनी के पास गए, अगस्थ्य मुनी ने अपनी योग शक्ती से विंध्य परवत को आदेश दिया कि वह जुक जाए, परवत ने उनकी आग्या मानी और आज तक वह व
02:49वातापी मास के रूप में बदल कर ब्रह्मनों को खिलाया जाता था और जब ब्रह्मन घोजन कर लेते तो इल्वल उसे फिर से जीवित कर देता जिससे वहां
02:59ब्राहमन के पेट से बाहर आकर उसे मार डालता था। जब अगस्त्य मुनी ने उसे खाया तो उन्होंने अपने योगबल से उसे पचा लिया और इलवल को भी अपने तपोबल से मार डाला।
03:11कई स्थानों पर शिवलिंग स्थापित अगस्त्य मुनी ने अनेक स्थानों पर शिवलिंगों की स्थापना की वे कांची पुरम, रामेश्वरम, तिरुवनंत पुरम, मदुरे और तिरुप्ती जैसे स्थानों में शिव उपासना को लोकप्रिय बनाने के लिए जाने जाते
03:41और भाशा विज्ञान में अतुलनिय है। उन्हें सबतर्शियों में से एक माना जाता है और दक्षन भारत में उन्हें विशेश सम्मान प्राप्त है।
03:50यह भी कहा जाता है कि उन्होंने तमिल भाशा की उत्पत्ती भगवान शिव से प्राप ज्यान के आधार पर की थी।
04:20प्राप जाता है। अगस्ति रुषी के बारे में एक और यह बात है कि भगवान सकंद ने जो रंकर जी के पुत्र सकंद है।
04:36इन्होंने जो है भगवान अगस्ति रुषी को श्री विद्या का पूरा महत्तो बताया था।
04:45श्री विद्या जो एक मोक्ष देने वारी और अईश्वर देने वारी विद्या है।
04:50इसमें अंतर का दलिता, सहस्त्रा, मिरता, दचति, इत्याधी सब गरंथ हैं।
04:56इन सब का प्रकाशन अगस्ति रुषी के द्वारा ही हुआ है।
05:00इनकी पत्री रुपा मुद्राजी जो थी, ऐसा बोला जाता है कि इस त्रिष्टी का पहला श्री अंतर जो है, इन्होंने बनाए था।
05:07इतले श्री विध्या के सभी गरंतों में इनका महत्वपुर्ण उल्लेक हर्जद किया गया है।
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