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  • 3 months ago
ब्रह्म रथी - रथ माया

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00:00नमस्कार आईए आज आपको सुनाते हैं राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादर डॉक्टर गुलाब उठारी का शरीर भी ब्रह्मांड शिंखना में पत्रिकायन में प्रकाशित आलेग जिसका शीर्षक है ब्रह्म रथी रथ माया
00:16माया ब्रह्म की यात्रा को 84 लाख योगियों में नियोजित करती हैं मूल में तो ब्रह्म की भाती माया भी कुछ करती नहीं हैं माया कामना हैं कामना में गती कर्म नहीं रहते होता सब उसके नाम से ही हैं माया का कार्य ब्रह्म की व्यवस्था तक ही सीमित रहता हैं शेश कार्
00:46इश्वरह सर्व भूता नाम रिद्देशे अर्जुन्तिष्ठती ब्रामयन सर्व भूतानी यंत्रा रूढानी मायया गीता 18.61 प्रत्यक्षरी रूपी यंत्र में आरूर हुए समस्त प्राणियों को इश्वर उनके कर्मों के अनुसार अपनी माया से रह्मन कराता हुआ प्
01:16कामना का आश्रह मन है मन की चंचलता ही कामना का स्वरूत तै करती है इसके अतिरिक्त भी कामना उदय होती है पूर्व कर्मों के योग से इसकी पूर्थी को तो टाला ही नहीं जा सकता अन्त समय में मन को बांधने वाली कामना ही नई योनी के लिए जीवात्मा को प्रेरित
01:46ुश्दिव्य रूप परमात्मा को ही राप्त होता है।
02:16इन गुणों का संग ही जीवात्मा के अच्छी बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है।
02:46इतलता थी संगुचन रूप था।
02:48मातरिश्वा वायू के कारण जल में बुदबुद पैदा हुआ।
02:52आकाश इस्थिती रूप तथा वायू गट्यात्मक होता है।
02:55बुदबुद का केंद्र सत्य रूप अव्य कहलाया।
02:58केंद्र और परीधी के मध्या यजू, गत्यात्मक पुरुष है।
03:02एक और अव्य का निर्मान है।
03:04तो दूसरी और फृदय रूप अक्षर प्राणों का निर्मान है।
03:08ब्रम्भा, विश्नु, इंद्र, अग्नीव, सोम, अक्षर प्राण है।
03:28अभिप्राय है कि निर्मान वर ध्वन्स दोनों एक ही बिंदु पर अवस्थित है।
03:32यही अक्षर प्राणों का कारिक्षेत्र है। जो प्रत्येक पिंद में विध्यमान है।
03:37सूर्य इस जगत में व्यक्त स्रिष्टी है। सूर्य में अव्य, अक्षर, ख्षर की पाचो कलाओं के साथ परात्पर की अर्ध मात्रा भी रहती है।
03:47स्रिष्टी का प्रथम शोडशी पुरुष होने से यही चराचर में आत्मभाव रूप में प्रतिष्ठेत रहता है।
03:53रिग्वेद के दशम मंडल के 177 सूक्त में वर्णन मिलता है कि परब्रह्म को तीन गुणों वाली माया से जानते हैं।
04:02जिस प्रकार सूर्य को हृदय में नियंत्रित मन, खिरण्य गर्ध से जानते हैं।
04:07सूर्य मंडल के केंदर में जो पुरुष है वही परब्रह्म है।
04:27अर्थात हिरन्य गर्भ ही ब्रह्म की मन से तुलना करते हैं
04:32जिस प्रकार बाहिय रूपा मिध्या भाव रश्मियों के स्थान पर विद्वान उपासक सूर्य पर ही ध्यान के इंद्रित रखते हैं
04:40परमात्मा ने विश्व की रचना की क्या-क्या रचना करना है
04:44इसी कामना रूप मन से स्रिष्टी की आदी का सारा निर्मान वेद के शब्दों से ही किया गया
04:52हिरन्य गर्भ ने उस वानी का प्रथमुच्चारन किया
04:55इस वानी की ब्रह्म के स्थान में गुप्त रूप से रक्षा करते हैं
05:00Shariar mai ha hirad ehi wani ka guptisthahn hai,
05:03Suriya prathah mole lakshya karke aata hai,
05:06sahay vahi suriya parangmukh ho kar chala jatai?
05:10Dinn mein rakshya karne wala sandhya mein vida ho jatai?
05:14Rakshya bhau se udayasht ho na hy suriya ki bhoumika hai,
05:18isi prakart prana bhi shariar ke rakshak, avinashi,
05:22sammukh evan parangmukh ho te jatai hai,
05:24suriya aakash marg se vichrn kata hai,
05:27प्राण नाडी मालवों से विचलन करता है
05:30जीवात्मा को केंदरस्थ मन्स्वरूप के ब्रह्म से तारतम्यद्वारा ही जाना जा सकता है
05:37अव्य का यह मन ही श्वोवसियस मन है
05:40अन्यस अभी मन के भी मिध्या रूप ही माने गये हैं नश्वर है
05:44अव्य की वेदत्रई रिक यजु साम ही वानी का रूप है
05:49सूर्य इस वानी को गुद्धी से धारन करते हैं
05:52सूर्य भी तीनों वेदों के साथ भ्रहमन करते हैं
05:55प्रातर रिचाओं के साथ दोपर में यजु वेद के साथ तथा साय काल में साम वेद के साथ
06:01शरीर में विद्यमान प्रानवायु ही वानी को प्रेरित करते हैं जिस प्रकार यह वानी मन रूप सूर्य में रक्षित रहती है उसी प्रकार शरीर के मध्य स्थित मन में रक्षित रहती है परमात्मा सृष्टी को आरंभ में मन से धारन करते हैं जीवात्मा में भी बीज र�
06:31Vrahm rup me kari kata hai maata artha brahm hai dharti rup hai maata ki bhita hai maaya ka
06:38ansh bhi rha ta hai jahaan brahm hai wahi maaya bhi hai dhoonu dattva su suksnu hoonne se
06:44jane nahi jate anubhuti mein to aate hi hai nahi to inke astitwaka mehatwa hi ho
06:51jaya ga maaya ko sa mjnne ke liye brahmu ke yatra marg pere saath chal kar sa mjna
06:56hooga maaya nne brahmu ko paida kiya apne vistar ke liye vaha annyatr kyun milayi maaya
07:03bal rup me brahmu ko vistar dheti hai, ec shariir se douser shariir me le jati hai, ardhanarishwak
07:09ki bhati brahmu ka ansh benn kar hi rehti hai, surya ke ághe kshar srishti utpann hooti
07:15hai, 84 laak yunio ka biech yahin se chalta hai, maaya yaha prakrati rup me rehti hai,
07:22sthul srishti tak, pahunchtay pahunchtay brahmu ke upar maaya, maha maaya, ahenkriti,
07:27akrati, prakrati, adhi aneak avran chan jate hai, sampun srishti mei brahmu
07:33aur maaya anusyut rahe kar yatra kertte hai, isi liye srishti ka pratyek prani ardhanarishwar hai,
07:39brahmu avrit hoota hai, maaya avrit kerti hai, brahmu aur maaya ka prakrati aur
07:45maaya purushka yahin mool sutra hai, purush jayse jayse avrano ko samajta jata hai,
07:50unse mukt hoota jata hai, maaya ke bhandhan khulte jate hai, maaya hi bhandhan aur
07:56muktika hai tu hai, anta mei maaya ke brahmu mei lean hoonne se prakrati ka khel,
08:02aur brahmu ki lila samapta ho jati hai.
08:04mei maaya you.
08:07dopinkora hai tu hai, manj 我ia da.
08:09mei maayaan los mbre lemasi ha Ettungóstung eben hoala namun
08:20kakrati aur mw ka hal Bahmu ki lila samapta lofps,
08:26dili mbha camera mbha.
08:27nape.
08:29
08:31
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