00:37इस बजार का नाम टूरी हट्री इसलिए है कि हमारे 36 गड़ में उस समय लड़कियों को टूरी बोलते थे
00:45एक मर्यादा का प्रतीक है कि यहाँ जो सबजी बेशते थे जो मनियारी चूरी सिंदूर बेशते थे वो महिलाएं लड़किया ही बेशती थी
00:52और कोशिस होता था कि महिलाएं ही आकर के खरीदे
00:55लगभग 600 साल पहले छोटी छोटी बच्चिया जिनकी उम्र 12 से 15 साल तक की होती थी
01:02टूरी हट्री में बैठ कर व्यवसाई करती थी
01:04उस समय साग सबजी, मनिहारी, पान की दुकान, धोबी, मोची और अनाज की दुकान हुआ करती थी
01:11वर्ग विशेश के लोग अपना-पना व्यवसाई करते थे
01:14इस टूरी हट्री का साक्षी और गवाँ यहां मौझूद लगभग 500 साल पुराना बर्गत और पीपल का पेड़ है
01:21इसके साथ ही यहां पुराना जगनात का मंदिर भी है
01:24इसका सबसे बड़ा गवाँ है चार-पांस साल पुराना पीपल का पेड़, बर्गत का पेड़ और वहीं के छोटा सा नाका था
01:33और जगनात का मंदिर है इतिहासिक है करेकताट पुर इतिहासिक बजार था बाद में समय के साथ सुरुख बजलता गया
01:41और जो सबजियां बेचती थी वह प्रगा से सुनकर परिवार की बच्चे थी, साकार परिवार या मराथ परिवार की और बाद में फिर्मनियाई समान ये दिगर समान जो है दुसरे परिवार समाच के लोग भी बिरते थे
01:54तो मिल जो लुकर के एक छोटा समजार ये होते गया और बाद में मराथा काल में राइपूर साहर की पुर्या और सक्ता की पूर्टे के लिए गोल बजार बनाए गया था
02:0436 गड़ में 14 रजवाडे और 36 जमीदारिया थी इन सभी जगह पर बाजार लगते थे जिसे हटरी के नाम से जानते थे
02:13लेकिन राइपूर का या बाजार टूरी हटरी के नाम से विख्यात रहा और आज भी लोग इसे टूरी हटरी के नाम से ही जानते है
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