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  • 1 year ago
Transcript
00:00हमारे यहां सुबह सूरज की रोषनी से नहीं होती होती जन्जीरों की खनक से
00:11हमारे हिस्से में जन्जीरे आई और उनके हिस्से में हक
00:24पर जब जुल्म हद से बढ़ता है, तो बगावत दिबादत बन जाती है
00:43याद रखना, डर से बनी हर सल्तनत, एक दिन उसी डर में डूप जाती है
00:54जिससे वो बदला समझ रहे हैं, वो तो बस शुरुआत है
01:08कौन से जो खेल शुरु हुआ था, अब उसी कौन से खत्म होगा
01:28कौन से जो खेल शुरु हुआ था, अब उसी कौन से खत्म होगा

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