00:00होमबाउंड दोहजार पचीस में रिलीज हुई एक भारतिय हिंदी भाषा की सशक्ट ड्रामा फिल्म है जिसका लेखन और निर्देशन नीरज घेवान में किया है
00:07नीरज घेवान को उनकी समीक्षकों द्वारा प्रशन से पहली फिल्म मसान मसान के लिए जाना जाता है
00:13होमबाउंड की कहानी कश्मीरी पत्रकार बशारत पीर के दोहजार बीस में दर न्यूयर्ट टाइम्स में प्रकाशत एक मार्मिक लेक पर आधारित है
00:21ये फिल्म उस अद्रिश्य आबादी की कहानी कहती है जिसने कोविड-19 महामारी के दोरान अचानक हुए राष्ट्र व्यापी लॉकडाउन का सबसे भयानक खामियाजा भुकता
00:29धर्म प्रोडक्शन्स द्वारा निर्मित इस फिल्म में ईशान खटर, मोहमद शोयब अली के रूप में, विशाल जेटवा, चंदन कुमार के रूप में और जानवी कपूर, सुधा भारती के रूप में ने मुखे भुमिकाए निवाई हैं
00:4126 सितंबर 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई इस फिल्म को समीक्षकों से जबरदस्ट प्रशन सामिली
00:48आलोचकों ने नीरज घेवान के समविदनशील नर्देशन, फिल्म के गंभीर विशेव, कलाकारों के शांदार प्रदर्शन और लेखन तथा संपादन की जमकर तारीफ की
00:57दो बचपन के दोस्त, एक बड़ा सपना फिल्म की कहानी उत्तर भारत के एक छोटे से गाउं के दो बचपन के जिगरी दोस्तों, चंदन कुमार और मोहम्मद शोयब अलीपर केंद्रित है
01:06चंदन दलित समुदाय से आता है, जबकि शोयब एक मुसलिम युवक है
01:10दोनों की प्रिष्ट भूमी बहत गरीब है, और वे रोजमर्रा के जीवन में जाती और धर्म आधारित भेदभाव, बिगटरी का सामना करते हैं
01:18इन दोनों के लिए पुलिस की वर्दी केवल नौकरी नहीं है, ये गरीवी और सामाजिक अपमान से बचने का एक कवच है, जो उन्हें वो इजज़त और सम्मान दिलाएगा, जिसके वे हगदार हैं, लेकिन जो उन्हें कभी नहीं मिला
01:30चंदन और शोएब के बीच धर्म और सामाजिक वर्द का अंतर होने के बावजूद उनकी दोस्ती बहुत गहरी है
01:35चंदन, जो स्वभाव से व्यवारिक है, अपने अधिक उग्र और भावुक दोस्त शोएब को अकसर मुसीबत से दूर रखता है
01:42वे दोनों पुलिस कांस्टेबल की भरती परीक्षा पास करने का सपना देखते हैं, जो की 2.5 मिलियन आवेदकों में से 3500 पदूं के लिए होती है
01:51यह अपने आप में एक युद्ध से कम नहीं है
01:53सामाजिक ताने बाने की कसोटी फिल्म बहुत ही मारमिक तरीके से दिखाती है कि कैसे जाती और धर्म का पूर्वाग्र उनके जीवन को हर मोर पर प्रभावित करता है
02:01चंदन का संघर्ष, जातिगत पहचान, दलित परिवार से आने वाला चंदन बाहर की दुनिया में सामाजिक बहिशकार से बचने के लिए अपनी जाती चिपाता है
02:10जब वो परिक्षा के लिए एक अन्य चात्रा सुधा भारती, जानवी कपूर से मिलता है तो वो अपना उपनाम बताने में हिचकी जाता है
02:17बाद में कॉलेज के दाखिले के फॉर्म में वो सामानिय श्रेणी, जेनरल कैटेगरी भरता है
02:22वो अपने इस जूट से अकेला महसूस करता है, जैसा कि वो एक दिल दहला देने वाले पल में स्विकार करता है
02:29सच बोलते हैं तो सबसे दूर हो जाते हैं, और जूट बोलते हैं तो खुद से
02:33शोएब का संघर्ष, धार्मिक पहचान, शोएब प्रतिभाशाली और इमानदार है, लेकिन अपने धर्म के कारण उसे अकसर अलग थलग महसूस कराया जाता है
02:41उसे लगातार अपनी निष्ठा साबित करनी पड़ती है
02:44एक सीम में, जब वो पानी प्यूरिफायर बेचने वाली कमपनी में सल्स की नौकरी पाने की कोशिश करता है
02:49तो उससे और उसके माता पिता से आधार कार्ड मांगा जाता है, जो धार्मिक पूर्वागरह को दर्शाता है
02:54ये लगातार होने वाला अपमान उसके अंदर की कोमलता को धीरे-धीरे खत्म कर देता है
02:59चंदन और शोईब दोनों लगातार गरीबी, बेरोजगारी और संस्थागत उदासिंता से जूचते हैं
03:06वे हर बार जब उपर उठने की कोशिश करते हैं, तो कोई न कोई मजबूरी या सामाजिक बाधा उन्हें वापस प्रारंबिक बिंदू पर खीच लाती है
03:12दोस्ती में दरार और सपनों का तूटना दोनों दोस्त पुलिस पर इक्षा देते हैं, और नतीजों का इंतजार करते हैं, जो भारत में महीनों या सालों तक खीच सकता है
03:21इसी दोरान उनके जीवन में बड़ा मोड आता है
03:24चंदन का चैन, चंदन परिक्षा पास कर लेता है
03:27जबकि शोएब असफल रहता है
03:29हालांकि पास होने के बावजूद
03:31नौकरी मिलने में लंबा समय लगना है
03:33शोएब का पलायन
03:35शोएब को एक मेकेनिक के रूप में दुबई जाने का मौका मिलता है
03:38जिसे वो ठुकरा देता है
03:40इसके बजाए वो एक वाटर प्यूरिफायल कंपनी के कार्याले में
03:44चपरासी, पियोन की नौकरी कर लेता है
03:46बरती दूरी, चंदन, सुधा भारती के प्रभाव में
03:50आगे की पढ़ाई करने का फैसला करता है
03:52जबकि शोएब अपनी मा के बिर्यानी के अचार और पकवान की छोटी-छोटी खुशियों में संतोश ढूनता है
03:57चंदन का सफल होना और शोएब का पीछे रह जाना
04:16परिवार के लिए सिमेंट की छटवाला एक पका घर बनाना है
04:19महामारी का कहर और घर वापसी जब दोनों दोस्त अलग-अलग शहरों में चोटी-छोटी नौकरियां करके अपने परिवार की जिंदगी समवारना शुरू ही करते हैं
04:27तभी 2020 में COVID-19 महामारी का कहर देश पर टूट परता है
04:30अचानक बिना किसी तैयारी या सूचना के राश्ट्रव्यापी लॉबडाउन घोशित कर दिया जाता है
04:36यह आपदा लाखो प्रवासी मजदूरों के लिए एक भयावय और दिल दहला देने वाली परीक्षा बन जाती है
04:41शोएब और चंदन भी खुद को फसा हुआ पाते हैं
04:45परिवहन के सभी साधन रुख जाते हैं और उनके पास अपने परिवारों तक पहुँचने का एकमात रास्ता होता है
04:50पैदल घर लोटना
04:52यह फिल्म जिसका शीर शकी, होम बाउंड, घर लोटने की तरप है
04:57अब अपने सबसे मार्मिक और यतार्थवादी भाग में प्रवेश करती है
05:00यह मजबूरी में घर लोट रहे प्रवासी मजदूरों की सामुहिक तरासदी को दिखाती है
05:05जिन्होंने सामाजिक उदासींता का सबसे बड़ा बोज उठाया
05:08यह मजदूर अब दूर की खबरे नहीं रहते बलकि असली लोग बन जाते हैं
05:12जिन्हें जीवित रहने के लिए अपना घर और परिवार छोड़ना पड़ा था
05:15नीरज घेवान इस भयावे समय का सटीकता से चितरन करते हैं
05:19यह याद बिलाते हुए कि समाज के एक वर्क के पास घर पर रहने स्टे होम का विलासिता भरा विकल्प नहीं था
05:25यह अंतिम भागी उस न्यू योग टाइम्स के लेक का मूल है
05:29जिसमें एक युवक अपने बेहोश दोस्त को तपती सडक पर गोद में लिए पानी पिलाने की कोशिश कर रहा था
05:34फिल्म का महत्वव और संदेश, होमबाउंड, सिर्फ दोस्ती, जातिवाद या पलायन पर बनी फिल्म नहीं है
05:41यह उन अद्रिश्य जीवनों का एक करवा आइना है, जिन पर इस देश के संस्थागत और सामाजिक विफलताओं का सबसे भारी बोच पड़ा
05:48फिल्म का शांत, सच्चा और उबदेश रहत लहजा इसकी सबसे बड़ी ताकत है
05:52यह हमें अपनी संवेदन शीलता पर सवाल उठाने के लिए मजबूर करती है
05:57हम कब किसी और के दर्द को महसूस करना भूल गए?
06:00फिल्म का अंत मर्मभेदी और विनाशकारी है, जो दर्शक को जगजोर कर रख देता है
06:04कलाकारों के हृदेश पर्शी प्रदर्शन, खासकर ईशान खटर और विशाल जेठवा की केमिस्ट्री, इस कहानी को एक अविस्मरनिय मानविय अनुभव बनाती है
06:12ये फिल्म आज के समय का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जहां सामाजिक विश्वास लगातार गिर रहा है, लेकिन विपरीत परिस्थितियों में भी मानवता और दोस्ती जीवित रहती है
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