00:00श्रीमत भगवद गीता अध्याए एक अर्जुन विशाधियोग श्लोक एक दृत्राष्ट्र वाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवखा मामकाहा पांडवास चैव किम कुर्वता संजया
00:19इसका भावार्थ ये है कि दृत्राष्ट्र ने कहा हे संजय धर्मभूमी कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्र और पांडू के पुत्रों ने क्या किया अब आईए इसे समझते हैं
00:34गीता का आरंब दृत्राष्ट्र के इस प्रश्ण से होता है वो स्वय मंदे थे इसलिए युद्ध भूमी में घट रही घटनाओं को जानने के लिए संजय से पूछते हैं
00:46कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा गया है ये भूमी केवल युद्ध भूमी नहीं बलकि धर्म और अधर्म की अंतिम परिक्षा का स्थल थी यहां केवल शस्त्रों का युद्ध नहीं बलकि जीवन मूल्यों का निरनायक संघर्ष होना था
01:01तृत्राश्ट्र ने अपने पुत्रों को मामकाह कहकर अलग और पांडवों को अलग बताया
01:07ये उनके मोह और पक्षपात को दर्शाता है
01:10एक राजा को सभी प्रजा को समान द्रिष्टी से देखना चाहिए
01:15लेकिन आसक्ती ने तृत्राश्ट्र को अन्याय की ओर जुका दिया
01:19ये श्लोक हमें सिखाता है कि मोह और पक्षपात इंसान को अंधा बना देते हैं
01:26सच्चा धर्म तभी प्रकट होता है जब हम निश्पक्ष होकर न्याय प्रिये द्रिष्टी से निरने ले
01:33श्रीमत भगवत गीता के अगले श्लोक को सुनने के लिए हमें फॉलो करें
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