00:00इसी जगह पर भगवान शिव ने पिया था विश जहां आज भी उनकी उपस्तिती महसूस होती है।
00:05ये है नील कंट महादेव मंदिर।
00:07आप देख रहे हैं धर्म।
00:08ये मंदिर रिशी केश।
00:09उत्तराखंड की सुरम में पहाड़ियों के बीच मधुमती और पंकजा नदी के संगम पर स्थित है।
00:14मंदिर के पुजारी गिरीजी के मताबिक एक बार देवताओं और असुरों ने अमरता का अमरित प्राप्त करने के लिए महासागर का मंधन करने का फैसला किया।
00:22उन्होंने भगवान विश्णू से मदद मांग जिसमें मंधन के दौराण मंदार परवत को मतनी के रूप में इस्तिमाल किया गया और वासुकी नाक को मंधन की रसी के रूप में प्रयोग किया गया।
00:30समुद्र की गहराई से कालकूट नामक फला हल विश निकला। विश इतना शक्तिशाली और खतरनाक था कि इससे पूरिस रिष्टी के नश्ट होने का खतरा था।
00:38विनाशकारी परिणामों के डर से देवता और असुर भगवान शिव की सहायता लेने के लिए दौट पड़े। तब भगवान शिव ने संसार के कल्यान के लिए विश को पी कर अपने कंठ में उसे धारण किया। जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया।
00:49जिसके बाद इस विश की ज्वलंता को शांत करने के लिए भगवान शिव ने पंकजा और मधुमती नवी के संगम के समी मंचपणी नामक व्रिक्ष के नीचे समाधी लेकर साथ हजार वर्षों तक तब किया।
01:00भगवान शिव जिस वरिश के नीचे समाधी लेकर बैठे थे उसी स्थान पर आज भगवान शिव का स्वयंभू लिंग विराजमान है और तभी से उन्हें नील कंठ के नाम से भी जाना जाने रगा।
01:08मंदिर के प्रांगण में ही एक अखंड धूनी जलती रहती है और उस धूनी की भभूत को श्रधालु प्रसाद के तौर पर भी लेकर जाते हैं।
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