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स्वयं की खोज || मै कौन हूं ? Discover Yourself #meditation

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00:00क्या आपको कभी शीशे में अपनी परच्छाईं देखकर यह सवाल मन में उठा? कि मैं वास्तम में कौन हूँ?
00:09नहीं, हमारा मतलब केवल आपके नाम, आपके शरीर या आपके आधारकार्ड की पहचान से नहीं है.
00:17हम उस गहरे रहसे में ही सवाल की बात कर रहे हैं, जो आपके अस्तित्व की जड़ों को हिला कर लग देता है.
00:26यहें वे सवाल है, जिसने युगों युगों से हर महान आत्मा, हर सादक और हर घ्यानी को जख जोरा है.
00:37भगवान बुद्ध ने इसकी खोज में राजसी वेबव को तिलांजली दे दी.
00:42महावीर ने इसके जवाब के लिए मौन की घहराईयों की ढोकी लगाई.
00:48भगवान श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन को यही सवाल फुलजाने का मार्ग दिखाया.
00:54और आज यही सवाल आपके सामने खड़ा है.
00:59आप कौन हैं?
01:02अगर आपको लगता है कि इसका जवाब चुट्कियों में मिल जाएगा,
01:07तो आप एक बड़ी ब्रह्म में हैं.
01:11यह सनसार की सबसे जटिल गुत्ती है,
01:16जिसे सुलजाने के लिए आपको उस अंजान रहा पर कदम रखना होगा,
01:22जहां कुछ ही सहसी पहुँच पाए हैं.
01:26लेकिन एक बार पक्की है,
01:29जिसने इस सवाल का जवाब पा लिया,
01:32उसने ना केवल अपनी जीवन को,
01:35बलकि पूरी दुनिया को एक नया हायाम दे दिया.
01:39सादकों, अगर आप सोच रहे हैं कि यह बस एक आम वीडियो है,
01:45तो आप गलत हैं.
01:47यह एक ऐसा रहस्य है,
01:50जो आपकी जीवन को पूरी तरह बधल सकता है.
01:55यह कोई साधरन उपदेश नहीं,
01:59बलकि एक गहरा सत्य है,
02:02जिसे केवल वही समझ सकते हैं,
02:05जो इस यात्रा को पूरे दिल से अपनाने को तैयार हैं.
02:11यह घ्यान किताबों से उधार लिया हुआ नहीं है.
02:16यह वह अनूभव है,
02:19जो रिशीयों, योगियों और महन संतों ने
02:23अपने साधना की आग में तपकर हासिल किया.
02:28लेकिन सवाल यह है,
02:31क्या आप इस सत्य को समझने के लिए तैयार हैं?
02:36क्या आप अपने असली पहचान की खोज के लिए तैयार हैं?
02:40अगर हां,
02:42तो इस यात्रा में हमारे साथ बने रहिए,
02:46क्योंकि यह कोई साधारन सफर नहीं,
02:49बल्कि एक चेतना का उद्रेह है.
02:54हलाकि यह रहा आसान नहीं.
02:57जब आप अपने असली स्वेरूप को जानने की कोशिश शुरू करते हैं,
03:02तो पूरा ब्रह्मान्ड आपके सामने एक नई लंग में प्रकट होता है.
03:08आखिर जीवन में सवाल क्यों उठते हैं?
03:12कुछ सवाल चोटे मोटे होते हैं,
03:15लेकिन कुछ इतने गहरे कि वे आपकी पूरी जिन्दगी को उलट पुलट कर रख दीते हैं.
03:23यह कोई संयोग नहीं कि जब भी कोई इनसान गहराई से सोचता है,
03:29तो उसका पहला सवाल यही होता है कि मैं कौन हूँ?
03:36अगर यह सवाल इतना साधरन होता,
03:39तो शायद इसे पूछने वाले लोग भी साधरन ही होती.
03:45लेकिन इतिहास गवा है,
03:48जो इस सवाल की गहराई में उतरा,
03:51उसने दुनिया को बदल कर रख दिया.
03:55जब यह सवाल बुद्ध के मन में उठा,
03:59तो उन्होंने राजमहल का त्याग कर दिया.
04:03जब स्वामी विवेकानन्द को यह सवाल सताने लगा,
04:07तो उन्होंने विश्व भ्रहमन कर सनातन सत्य को दुनिया के सामने रखा.
04:14श्री क्रिषन ने अर्जुन को गीता में इसी सवाल का जवाब दिया,
04:19और अर्जुन का जीवन एक योधा से योगी में बदल गया.
04:25लेकिन यह सवाल सिर्फ महापरुसों के लिए नहीं,
04:30यह आप के लिए भी है.
04:33क्या आपने कभी खुज से यह पूछा?
04:36अगर नहीं, तो शायद आप अब दक एक गहरी नीन में जी रहे थे.
04:43लेकिन अगर यह सवाल आपके मन में कुलबला रहा है,
04:49तो यह संकेत है कि आपकी चेतना जागने लगी है.
04:55हाला कि इस सवाल का जवाब खोजना इतना आसान नहीं.
05:00जैसे ही आप इसकी गहराई में उतरते हैं,
05:04ब्रह्मान्ड आपके सामने एक रहस्य में एक दुनिया खोल देता है.
05:10कई रिशियों ने ध्यान में डूब कर इस सवाल का जवाब तलाशा,
05:15लेकिन जैसे जैसे वे गहरे गई,
05:18उन्हें एहसास हुआ कि यह दुनिया वैसी नहीं है, जैसी दिखाई देती है.
05:25अगर आप सोचते हैं कि आप सिर्फ एक शरीर हैं,
05:30तो एक पल ठहर का सोचिए.
05:33जब आप सोते हैं, तो आप कहाँ चले जाते हैं?
05:39जो सबने आप देखते हैं, उन्हें कौन देख रहा होता है?
05:44अगर आपकी आत्मा अमर है,
05:47तो क्या आपकी पहचान सिर्फ इस शरीर तक ही सिमित हो सकती है?
05:53यह सवाल इतना गहरा है कि इसे समझने के लिए,
05:57आपको अपने पूरी चेतना को जख जोरना होगा.
06:02स्वेम की खोज से जीवन में क्या बदलाव आते हैं?
06:06जब हम अपने असली स्वेरूप को जानने लगते हैं,
06:09तो हमारे जीवन में एक नई सपस्टता जनम लेती है.
06:15हमें यह समझ आने लगता है कि हम वास्तम में क्या चाहते हैं और क्या नहीं?
06:22यह बदलाव सिर्फ बाहरी नहीं बलकि भीतर से आता है.
06:29क्या आपने कभी महसूस किया कि कई बार हम कुछ काम सिर्फ इसलिए करते हैं
06:35क्योंकि समाज हमसे यही अपेक्शा करता है?
06:39लेकिन क्या यही वहे है जो हमारी आत्मा जाहिती है?
06:46स्वेम की खोज हमें उन जंजीरों से आजाद करती है
06:51जो बिना हमारी मरजी के हम पर ठोप दी गई हैं.
06:57यहें हमें ने केवल बाहर बलकि भीतर से स्वेतंतर बनाती हैं.
07:03लेकिन यहां एक गहरा रहस्य चपा है.
07:08जो लोग स्वेम की खोज में डूपते हैं
07:12वे अचानक दुनिया से अलग थलग महसूस करने लगते हैं.
07:18उन्हें लगता है कि यह संसार महज एक छाया है
07:23और असली दुनिया कहीं और है.
07:27शिशी मुनियों ने हजारों वर्षों तक ध्यान और योग के जरीए
07:32इस गूड सत्य को समझने की कोशिश की.
07:36लेकिन क्या यह सिर्फ उनके लिए था?
07:40नहीं!
07:42हर इंसान में वेह शक्ती है
07:44जो उसे अपने अतली स्वेरूत तक ले जा सकती है.
07:50जब हम इस यात्रा पर आगे बढ़ते हैं
07:53तो हमें अपने बारे में कई चोंकाने वाली बातें पता चलती हैं.
07:59हमें एहसास होता है कि हमारी असली पहचान वेह नहीं
08:05जो हमें अब तक सिखाई गई थी.
08:08यहें पहचान हमारे भीदर छिपी है.
08:12लेकिन इसे देखने के लिए हमें अपनी चेदना को जागरित करना होगा.
08:19लेकिन कैसे?
08:20क्या हमारी पहचान सिर्फ हमारा नाम, धर्म, समाज या परिवार है?
08:28या यहें सब एक माया जाल है?
08:32अगर आप सोचते हैं कि आपकी पहचान वही है, जो आपको जन्म से मिली, तो एक पल रुख कर फिर से सोचिए.
08:42क्या आपने कभी गौर किया कि जब कोई बच्चा जन्म लेता है, तो वह किसी भाषा, धर्म या परंपरा से बना नहीं होता?
08:52उसे यहें सब बाद में सिखाया जाता है, उसे बताया जाता है कि उसका नाम क्या है, वह किस जाती या धर्म से है?
09:01लेकिन अगर यही बच्चा किसी और देश, किसी और संस्कृति में जन्म लेता, तो क्या उसकी पहचान वही होती? नहीं!
09:12यही हमारे जीवन का सवसे बड़ा ब्रह्म है. हमने अपनी पहचान को बाहरी चीजों से जोड लिया, जबकि हमारी असली पहचान कहीं और है.
09:25जो लोग इस सत्य को समझ लेते हैं, वे दुनिया को एक नए नचरिय से देखने लगते हैं.
09:33क्या आपने उन संतों और महापुरुषों की काहनिया सुनी हैं, जिन्होंने अपनी बाहरी पहचान को पूरी तरह से त्याग दिया?
09:43बुद्धने राजसी जीवन छोडा, महावीर ने अपने सारे वस्त्र तक त्याग दिये?
09:50रामकृष्ण परमहंस ने खुद को हर धर्म और पहचान से उपर उठा लिया.
09:57इन्होंने समझ लिया था कि हमारी असली पहचान किसी नाम या शरीर तक सीमित नहीं है.
10:05लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि हमें भी सब कुछ छोड कर जंगल में चले जाना चाहिए?
10:13बिल्कुल नहीं. यह यात्रा भीतर की है, बाहर की नहीं.
10:21अगर हम गोर करें, तो हमारी असली पहचान बाहरी चीजों से नहीं, बलकि हमारे आंतरिक अनुभवों से बनती है.
10:31इसका सबसे बड़ा परमान यह है कि जब हम गहरे ध्यान में डूबते हैं, तो हमें अपने शरीर, नाम और यादों से परे कुछ महसूस होता है.
10:43यही हमारी सची चेतना है.
10:47लेकिन यहां एक बड़ा सवाल उठता है.
10:51अगर हमारी पहचान हमारी चीजों से नहीं बनती, तो हम हैं क्या?
10:58बचपन से जवानी तक की यात्रा में हमारी पहचान कैसे बनती है?
11:04क्या हम वही हैं, जो हमें सिखाया गया है?
11:09या हमारी असली पहचान इससे कहीं गहरी है?
11:14जब हम चोटे होते हैं, तो हमें वही बताया जाता है, जो हमारे माता-पिता, सिख्षक और समाज जाहिते हैं.
11:25हमें सिखाया जाता है कि हमें क्या करना चाहिए, कैसे सोचना चाहिए, और क्या बनना चाहिए?
11:33लेकिन क्या किसी ने हमें बताया कि हम वास्तम में कौन है?
11:39जरह सोचिए, अगर आपको जनम के बाद कोई नाम नहीं दिया जाता, तो आप कौन होते?
11:48अगर आपको कभी ना सिखाया जाता कि आप किसी धर्म, जाती या समुदाय से हैं, तो आप खुद को कैसे पहँचानते?
11:58यही वेह रहस्य है.
12:00हमने अपनी पहँचान को बाहरी चीजों से जोड लिया, लेकिन हमारी असली पहँचान भी दरी है.
12:09क्या आपने कभी देखा कि कुछ बच्चे बच्पन से ही अलग होते हैं?
12:15कुछ को संगीत का शौक होता है, कुछ को कितावे पसंद होती है, कुछ को प्रकृती से प्यार होता है, और कुछ अकेले रहना पसंद करते हैं?
12:26एसा क्यों?
12:29क्योंकि हमारी आत्मा पहले से ही एक दिशा लेकर आती है.
12:34लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, समाज का दबाव हमें उस दिशा से भटका देता है.
12:41हम अपनी असली पसंद, अपने सपनों को छोड़कर वही बनने लगते हैं, जो समाज हमसे ही चाहेता है.
12:51लेकिन जब कोई अपनी असली पहचान की खोज शुरू करता है, तो उसे कई विरोधों का सामना करना पढ़ता है.
13:00क्या आपने सुना कि जब महाभी ने सब कुछ त्याग दिया, तो उनकी परिवार और समाज ने उन्हें पागल करार दिया?
13:10जब स्वाभी विवेकानन्द ने सन्यास लिया, तो उनके अपनी लोग उनसे नाराज हो गई.
13:18इसा इसलिए क्योंकि समाज उन लोगों से डरता है जो अपनी असली पहचान को जान लेते हैं.
13:27लेकिन जो इस डर को पार कर जाते हैं, वे एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करते हैं, जहां कोई सीमा नहीं, कोई बंधन नहीं, सिर्फ अनूबव है.
13:41सवाल यह है, अगर हमारी पहचान समाज की बनाई होई नहीं, तो हमारी असली पहचान क्या है?
13:51विज्ञान इस बारे में क्या कहते थे?
13:54क्या हमारी चेतना सिर्फ शरीर और दिमाग तक सीमित है?
13:59या हम उससे कहीं ज्यादा हैं?
14:02अगर आप सोचते हैं कि आप सिर्फ शरीर और दिमाग हैं, तो सोचिए, जब आप सोते हैं, तो आप कहाँ चले जाते हैं?
14:13जो सपने आप देखते हैं, उन्हें कौन देख रहा होता है?
14:18और जब आप गहरे ध्यान में होते हैं, तो वहे कौन है जो शान्ती का नुभव करता है?
14:26यही वह रह से है.
14:29हम जो सोचते हैं, वहे हमारा दिमाग सोचता है.
14:34लेकिन जो महसूस करता है, जो जीवन को जीता है, वहे हमारी चेतना है.
14:42यहें चेतना हमारे विचारों, भावनाों और शरीर से भी परे है.
14:49अगर चेतना सिर्फ शरीर और दिमाग तक सीमित होती, तो मिर्त्यू के बाद सब कुछ खत्म हो जाना चाहिए.
14:58लेकिन ध्यान और योग के गहरी आस्थाओं में, रिशीयों और वैज्ञानिकों ने पाया कि चेतना शरीर के बिना भी मौजूद रह सकती है.
15:10क्या आपने उन लोगों की कहानिया सुनी, जिन्होंने मिर्त्यू के करीब जाकर भी खुद को जीवित महसूस किया?
15:18कई वैज्ञानिक प्रियोगों में यह पाया गया कि जब लोग गहरे कॉमा में होते हैं, तब भी वे अपने आसपास की चीजों को महसूस कर सकते हैं.
15:31लेकिन कैसे? अगर दिमाग काम नहीं कर रहा, तो फिर कौन देख और सुन रहा है?
15:39यही हमारी असली पहचान का संगीत है. हम ने तो सिर्फ शरीर हैं, नहीं सिर्फ दिमाग. हम वे शुद्ध छेतना हैं, जो इस शरीर और इस दुनिया से परे भी मौजूद हैं.
15:58विज्ञान भी मानता है कि हमारा दिमाग एक रिसी वर्गी तरह काम करता है, जो छेतना को ग्रहन करता है.
16:08लेकिन यह छेतना आती कहां से है? क्या यह बरमांड से जुड़ी है? क्या यह अनंत है?
16:17जो लोग ध्यान और सादना में गहराई तक जाते हैं, वे इस छेतना को महसूस कर सकते हैं.
16:26यही कारण है कि महान योगी और रिशी हजारों सालों तक ध्यान में बैठे रह सकते थे, बिना किसी बाहरी उर्जा के.
16:37वे किसी और स्थोर्च से उर्जा ले रहे थे, एक ऐसी उर्जा, जो हमारी छेतना से जुड़ी है.
16:46लेकिन अगर हम यह छेतना हैं, तो फिर हमें यह क्यों भूल जाते हैं? क्यों हम खुद को सिर्फ एक नाम, शरीर और एक दिमाग तक सीमित कर लेते हैं?
16:59आध्यात्मिक द्रिश्टी कौन से स्वेम की खोज कैसे कीजा सकती है? क्या ध्यान और साधना वास्तम में हमारी छेतना को जाग्वित कर सकते हैं?
17:11अगर आप किसी योगी या संत से पूछें कि मैं कौन हूं, तो वे कोई किताबी जवाब नहीं देंगे.
17:20वे कहेंगे अपनी आँखें बंद करो और भीतर जाँगो. क्योंकि यह जवाब पढ़कर नहीं, केवल अनुभव से जाना जा सकता है.
17:31जब कोई गहरे ध्यान में जाता है, तो उसे एक नई दुनिया का अनुभव होता है.
17:39पहले उसे सिर्फ अंधेरा दिखता है, लेकिन जैसे जैसे उसकी एकाग्रता बढ़ती है, वे प्रकाश, ऊर्जा और अदबुत कमपन महसूस करने लगता है.
17:51क्या आपने कभी अनुभव किया कि जब आप किसी सांत जगह पर बेटकर गहरी सांस लेते हैं, तो आपका मन हलका और शांत होने लगता है?
18:03यह कोई साधारन घटना नहीं, यह इस बात का संकेत है कि आपकी चेतना जागने लगी है.
18:12रिश्यों ने हजारों साल पहले यह रहस्य खोज लिया था कि अगर हम अपने विचारों को शांत कर लें, तो हमें अपनी असली बहचान का अनुभव होने लगता है.
18:26यहां एक बड़ा रहस्य है, आपकी चेतना सिर्फ आपके शरीर तक सीमित नहीं है, यह पूरे ब्रह्मान्ण में फैली हुई है.
18:39योगी जब ध्यान में जाते हैं, तो वे खुद को शरीर से अलग महसूस करने लगते हैं.
18:47वे ऐसा अनुभव करते हैं, जैसे वे सिर्फ एक उर्जा हैं, एक शुद्ध परकाश, यही आत्मा का अनुभव है.
18:59लेकिन इस अवस्था तक पहुँचना आसान नहीं, क्योंकि हमारा मन हमेशा भागता रहता है, कभी हतीत में, तो कभी भविश्य में.
19:12और जब तक मन शांत नहीं होता, तब तक हमें अपनी असली पहँचान का अनुभव नहीं हो सकता.
19:21तो क्या इस चेतना को जगरित करने का कोई तरीका है?
19:25हाँ, योग और ध्यान की कुछ गुप्त विदियां हैं, जिनके जड़िये हम अपनी चेतना को पूरी तरह जगरित कर सकते हैं.
19:37प्राचीन रिशियों ने इन विदियों को इतने गुप्त रूप में रखा, कि सिर्फ वही लोग इन्हें सीख सकते थे, जो पूरी तरह तयार थे.
19:49लेकिन अब यह घ्यान धीरे धीरे दुनिया के सामने आ रहा है.
19:54लेकिन क्या हर कोई इस घ्यान को प्राप्त कर सकता है?
19:58जब कोई इस आत्म खोज की यात्रा पर निकलता है, तो उसे सबसे पहले समाज और बाहरी दुनिया की धारणाओं से जोजना पड़ता है.
20:10क्या आपने गौर किया?
20:11कि जब भी कोई अपनी असली पहचान को जानने की कोशिश करता है, तो समाज उसे रोकने की कोशिश करता है.
20:21उसे कहा जाता है, एसा मत दूचो, यह गलत है.
20:26लेकिन क्यों?
20:28क्योंकि समाज हमेशा आपको एक धाचे में बादना चाहिएता है.
20:34वह चाहिता है कि आप वही सोचे, जो बाकी लोग सोचते हैं.
20:40लेकिन जो इस दायरे से बाहर निकलते हैं, वे असली रहस्य को जान जाते हैं.
20:48क्या आपने कभी महसूस किया कि जब आप ध्यान या गहरे चिंतन में डूपते हैं, तो आपको एक अनोखा आनंद मिलता है?
20:58यह कोई साधारन चीज नहीं.
21:01यह इस बात का संकेत है कि आपकी आत्मा जागने लगी है.
21:07लेकिन यहीं से सबसे बड़ा विरोध शुरू होता है, समाज और आपकी आत्मा के बीच.
21:16जैसे ही आप अपने असली पहचान को समझने लगते हैं, दुनिया आपको बदलने की खोशिश करती है.
21:25क्योंकि अगर आप सचमुझ जान गए कि आप इस शरीर, नाम या पहचान से परे हैं, तो आप किसी पी बाहरी नियंतरन से मुक्त हो जाएंगे.
21:38और यही समाज को सबसे ज्याता डराता है.
21:43महान जिशी और योगी इसी कारण जंगलों और गुफां में चले गई.
21:50अभी समझ चुके थे कि यह दुनिया एक बरम है.
21:55लेकिन क्या आद्म खोज के लिए हमें भी समाज से भागना होगा?
22:01नहीं. अगर हम इस दुनिया में रहते हुए भी भीतर से मुक्त हो जाएं, तो यही सबसे बड़ा योग है.
22:12लेकिन यह आसान नहीं. क्योंकि यह दुनिया हमें बार-बार हमारी जूटी पहचान की याद दिलाती है.
22:22तो क्या इस दुनिया में रहते हुए भी हम अपने असली स्वेरूप को पहचान सकते हैं?
22:29कला और सेम की अभिविक्ति कैसे जोड़े हैं?
22:32क्या संगीत, लेकन और रचनातमक्ता हमें हमारी असली पहचान से जोड़ सकते हैं?
22:39जब हम कोई मदुर संगीत सुनते हैं, तो क्यों लगता है कि यह हमें कहीं और ले जा रहा है?
22:47जब हम कोई कवीता पढ़ते हैं, तो क्यों लगता है कि यह हमारी आत्मा से बात कर रही है?
22:54यही वह रहस्य है.
22:57कला सिर्फ बाहरी दुनिया की शीज नहीं, यह आत्मा का संधीस है.
23:03यह वह माध्यम है, जिसके जरीए हमारी चेतना खुद को विक्त करती है.
23:10क्या आपने देखा कि दुनिया के सबसे महान कलाकार, कवी और संगीतकार साधारन जीवन नहीं जीते थे?
23:19वे दुनिया से कटे हुए से रहते थे, क्योंकि वे किसी और दुनियों में डूबे थे.
23:25मीरा के भचन सिर्व शब्द नहीं थे, वे उनकी आत्मा की भुकार थे.
23:32कबीर के दोहे सिर्व कवीता नहीं थे, वे उनके अनुभव की गहराई से निकले सत्य थे.
23:40रविन्दनाथ टेकोर की रचनाएं सिर्व साहित्य नहीं थे, वे आत्मा खोज की यात्रा के निशान थे.
23:49जब कोई कला में डूब जाता है, तो वे अपने भीतर की सच्चाई को व्यक्त करने लगता है.
23:57क्या आपने कभी अनुभव किया कि जब आप कोई संगीद गुन-गुनाते हैं, कोई चित्र बनाते हैं या कुछ लिखते हैं, तो आपको एक अनोखी शान्ती मिलती है?
24:10यह इस बात का संकेत है कि आपकी आत्मा जागने लगी है.
24:16क्योंकि हमारी चेतना जब बेतर से वहती है, तो वहे शब्द, ध्यनी, रंग, और लै के रूप में बाहर आती है.
24:26लेकिन यहां एक बढ़ा रहस्से है.
24:30जब हम किसी रचनात्मक कारिये में पूरी तरह खो जाते हैं, तो हम अपने असली स्वेरूप से जोड़ने लगते हैं.
24:40इसलिए कई योगियों और संतों ने संगीत, निर्त्य और काव्यको साधना का माध्यम बनाया.
24:48लेकिन क्या आत्मा को सिर्फ कला के जरिये ही खोजा जा सकता है?
24:54संगर्स और स्वेम की खोज कैसे जोड़े हैं?
24:58क्या जीवन की संगर्स हमें अपनी असली पहचान तक ले जा सकते हैं?
25:03क्या आपने गौर किया कि जब हम किसी कठिन दोर से गुझरते हैं, तो हमारी सोच और समझ पहले से ज्यादा गहरी हो जाती हैं?
25:13जब जीवन हमें सबसे बड़ी चुनोती देता है, तबी हमें अपनी बीतर की असली शक्ती का एसास होता है.
25:20और यही संगर्स का सबसे बड़ा रहस्य है.
25:27इतिहास में हर महान आत्मा ने कठिन संगर्सों का सांग्र किया.
25:33कभीर को हिंदु और मुसलिम दोनों समाजों ने खारिज किया.
25:38लेकिन इन संगर्सों के बीच उन्होंने अपनी असली पहचान की खोज किया.
25:44क्यों?
25:46क्योंकि जब जीवन कठनाईयों से घिरता है, तो यह हमारी चेतना को जगाने की कोशिश करता है.
25:54क्या आपने कभी महसूस किया कि जब हम सबसे ज्यादा परिशान होते हैं, तबी हमें कुछ नया समझ में आता है.
26:03क्योंकि जब जीवन आसान होता है, तो हमारा मन भी सुस्त रहता है.
26:09लेकिन जब संगर्स आता है, तो हमारी चेतना जगरित हो जाती है.
26:15संगर्स हमें अपनी असली पहचान तक ले जाने का स्तव से सक्तिशाली माध्यम है.
26:22जो लोग इस सत्य को समझ लेते हैं, वे संगर्स से नहीं गरते, बल्कि उसका स्वागत करते हैं.
26:31क्योंकि वे जानते हैं कि हर चुनोती के पीछे एक नया द्वार खुलनी वाला है.
26:37अगर हम संगर्स से भागते हैं, तो हम अपनी असली शक्ति को कभी नहीं जान पाएंगे.
26:46लेकिन अगर हम इसे स्वीकार करते हैं, तो हम उस अवस्था में पहुँच सकते हैं, जहां हमारे भीतर कोई भै, कोई कमजोरी नहीं रहती.
26:57यही आत्म खोज की अन्तिम वस्था है.
27:01जब वेक्ति अपने संगर्सों को गले लगाता है, और समझ जाता है कि हर कठिनाई उसे जगाने के लिए आई है, यही वेहपल है, जब हम अपने असली पहँचान को पूरी तरह महसूस करने लगते हैं.
27:18अब सवाल यह है, क्या आप इस यात्रा को सिर्फ एक कहानी की तरह सुनेंगे या इसे अपने जीवन में उतारेंगे?
27:27क्योंकि यह यात्रा यही खत्म नहीं होती, यह तो बस शुरुवात है.
27:33सादकों, यह कोई साधारन ग्यान नहीं था, यह एक ऐसा रहस्य था, जो आपकी पूरी जिंदगी को बदल सकता है.
27:42इस यात्रा में हमने समझा कि हम सिर्फ एक नाम, शरीर या समाज की पहँचान नहीं हैं, हम इससे कहीं ज्यादा हैं.
27:52अगर आपने इस यात्रा को ध्यान से सुना है, तो अब आपको यह ऐसास हो गया होगा कि जीवन सिर्फ वही नहीं है, जो दखाई देता है. हमारा अस्तित्व इससे कहीं गहरा और विशान है.
28:07लेकिन यह सिर्फ शुरुवात है, जो लोग इस यात्रा को सुनकर छोड़ देते हैं, वे वापस उसी दुनिया में चाले जाते हैं, जहां वे पहले थे. लेकिन जो इसे अपनाते हैं, वे अपने जीवन में एक नया अध्याय शुरू करते हैं, जहां ग्यान है, शानती है
28:37जो आप सिर्फ एक कहानी की तरह सुनकर भूल जाएंगे या इसे अपने जीवन में उतारेंगे.
28:43अगर यह घ्यान आपको उपयोगी लगा, अगर आपको यह रहसे कुछ नया सिखा गया, तो इस चैनल से जुड़े रहें.
28:51क्योंकि यह सिर्फ एक वीडियो नहीं थी, यह एक आध्यात्मिक यात्रा की शुरुवात थी. हम आगिपी ऐसे ही रहसे में गहरे और जीवन बढलने वादे घ्यान आपके लिए लाते रहेंगे.
29:06अगर आप इस यात्रा को और गहराई से समझना चाहेते हैं, तो हमारे चैनल से जुड़े रहें. यहां हम ध्यान, उर्जा और आंतरिक शक्ती से जुड़े गूड रहिस्चों को उजागर करते रहेंगे. अगर यह अनूभव आपको पसंद आया, तो इसे अपने दोस्तो
29:36करेंगे, ताकि ध्यान और आत्मज्ञान की यह यात्रा अन्वरत चलती रहें. इस वीडियो को अन्त तक देखने के लिए आपका तहीं दल से धन्यवाद. आपका प्यार और समर्थन ही हमारा सबसे बड़ा अशिर्वात है. तो चलिए आज की इस यात्रा को यहीं विरां �
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