00:00।
00:30आदोनिक जलवायू चुनोतियों से निपटने के लिए पारंप्रिक जल प्रणालियों की भूमिका को एहमियत देती है।
01:00राजों की बावली के संरक्षन के लिए सबसे पहले पारंप्रिक तरीकों से गाद निकाला गया।
01:15इसकी मरमत की गई फिर पानी की गुणवत्ता में सुधार किया गया।
01:18लोधी वंश की बास्तुकला की अखंडता को बनाये रखने के लिए चूने का प्लास्टर और मोर्टा लगाया गया।
01:25साथ ही नया ड्रेनेर सिस्टम बनाया गया।
01:27पानी की प्राकर्तिक स्वच्छता बनाये रखने के लिए उसमें मचलियां भी डाली गई।
01:32पहले तो सफाई करने पड़ी, the foliage and the vegetation around it had to be cleared.
01:38The water, which was the most important part, वो पानी का level उपर चड़ाया था।
01:43और अगर मेरे पीछे देखिएगा, यहां तक उचर तक 2021 में आ गया था पानी।
01:47तो पहले काम तो यह हुआ कि हमारे एक्सपर्ट्स हैं, उन्होंने पहले water को साफ किया, पूरा नीचे level तक लेके गए।
01:54और अगर आप बाद में कैमरा में देखेंगे कि इसके जो level है यह तकरीबन 16 मीटर की है, तो मतलब कि जो आपको देखता है उसके आधा और अंदर पानी के नीचे भी है, तो यह सब पानी को पहले निकालके पूरी जगा को अच्छी तरह से साफ किया।
02:10राजों की पावली जैसे एतिहासिक जल स्त्रोथ, जल प्रबंधन और रोजमर्रा के कामगाज के लिए काफी उप्योगी माने जाते थे, खास कर ऐसे लागों में जहां नदी के पानी का बाहव कम होता था।
02:22रोजाना की जरूरत के लावा, इनका इस्तमाल यास्परियों के लिए कमरे के तौर पर और सांस्कृतिक संगम स्थल के रूप में भी किया जाता था।
02:52इसके वाद आप देखें तो इसके बहुत सारे दूसरे आस्पेक्स भी हैं जैसे कि इसका जो सांस्कृतिक अगर आपक्ष देखें तो बावली ऐसा स्थान है जहां पर ना सिर्फ आप पानी से जुड़ी काम कर रहे हैं बलकि वहाँ पर एक कल्चरल कॉन्फूएंस भी है
03:22झाल
03:23झाल
03:24झाल
03:25झाल
Comments