00:01चिर्याने अपनी लकडियों की गटरी बना दी थी
00:04मम्मा लकडियां जमा हो गई हैं अब हम दाना ठोड़ लेती हैं
00:09गुर्या बेटी मैंने नदी के पास कल कुछ दाने चावल के देखे थे
00:13हम वहाँ से चावल ले आती हैं
00:16और फिर बाद में आकर अपनी लकडियां उठाकर घर चली जाएंगी
00:20ये सोचकर दोनों मा बेटी नदी की तरफ चली जाती हैं
00:25उसी जंगल में रहने वाले कवा और कवी भी लकडियां ढोंड रहे थे
00:30गोरी कवी की नज़र लकडियों की उस गटरी पर जाती है
00:35कालू कालू जी अब हमें काम और महिनत की कोई जरूरत नहीं है
00:40वो देखो सामने लकडियां पढ़ी है
00:42शायद कोई बाक्षी ये लकडियां रहकर गिया होगा
00:45हम वो लकडियां उठाकर जल्दी जल्दी यहां से भाग जाते हैं
00:50कवा वो लकडियां उठाता है और दोनों बती बतनी अपने घर की तरफ भाग जाते हैं
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