00:00नित्य जीवन में यद्य का मेहत्व यद्य एक अत्यंत पवित्र दैविय पूजा है।
00:06यद्य एक प्राचीन हिन्दू परंपरा है जो अनाधिकाल से चली आ रही है।
00:12वेदो में कहा दया है यद्यो वै विश्णवः जिसका अर्थ है कि यद्य को भगवान विश्णो का स्वरूप माना जा सकता है।
00:21यद्य शब्द यज्धातु से बना है जिसका अर्थ है देवताओं की पूजा।
00:27आथ यद्य देव पूजा है।
00:30भारत में प्राचीन काल से ही विभ्धिन प्रकार की यद्य होती आ रही है।
00:36यद्य का अंतिम लक्षे देवताओं को संतुष्ट करना और उन्ही प्रसंद करना है।
00:42सामानियता यद्य अगनी, हवन के सामने वेद मंत्रों के साथ किया जाता है।
00:49यद्य के साथ अनेक नियम और परमपराई जुरी हुई हैं।
00:54अगनी होतर यद्य का एक महत्वपोन हिस्सा है और यह विश्वास है कि यद्य की अगनी में डाली गई हर वस्तु देवताओं तत पहुचती है।
01:04यद्य की विधी
01:06वैदिक यद्य में अध्वर्यू मुख्ष्य पुरोहित होता है और उसके निर्देशन में सभी यद्य कार्य संपन होते हैं।
01:14उसे सहायता देने के लिए कई पुरोहित और विद्वान होते हैं जो वेद मंत्रों का पात करती हैं।
01:22यद्य में एक या अधिक हवन अधनिया हो सकती हैं जिन में गी, दूद, अनाज आधी की आहुतिया दी जाती हैं।
01:31यद्य कुछ मिन्तों से लेकर कई वर्षों तक चल सकती हैं।
01:36विभिन प्रकार के यद्य होती हैं जिन में अश्वमेद यद्य, उत्रकामिष्टी यद्य, राजसू यद्य, सर्प यद्य, विश्वजीत यद्य, दायत्री यद्य आधी शामिल हैं।
01:48इतिहास में कर्दम प्रजापती के पुत्र इला ने अश्वमेद यद्य करके अपनी मरदानगी वापस पाई।
01:56श्रीराम ने रावन का वद करने के बाद अयोध्या में राज्या विशेक के उपरांक अश्वमेद यद्य किया।
02:04महाभारत में जनमेजय ने सर्प यद्य किया। यद्य के प्रकार यद्यों के छए प्रकार होते हैं।
02:12एक, द्रव्ययद्य, धन को नियाय पूर्वक और धर्म के अनुसार अरजित करना और उसे धर्म कारियों में लगाना।
02:20दो, तापयद्यत, ज्यानादनी से आत्मा को तपाकर उसे पवित्र और तेजस्वी बनाना ही पवित्र तापयद्य है।
02:28तीन, स्वाध्यायद्यत, किसी धी विद्या का अध्ययन मातर ही नहीं, बलकि उसे समझकर लोग कल्यान में उप्योग करना स्वाध्यायद्य है।
02:38चार, योब्यद्य, यमनियम आदी से मन पर नियंतरन प्रात्त करकि मानसिक शक्ती अरजित करना योब्यद्य है।
02:46पांच, ज्यान्यद्य, यह विचार करना कि मैं कौन हूं, मेरा जन्म क्यो हुआ है, मुझे क्या करना चाहिए और आत्मदर्शन का अनुभव प्रात्त करना ही ज्यान्यद्य है।
02:59शे संशित्यद्य अपनी काम, क्रोध, मद और मचसर जैसी भावनाओं पर विजए प्रात्त कर नियम्पूर्व कर्म करना ही संशित्यद्य है।
03:09इनके अलावा यज्य के तीन और प्रकार होती हैं।
03:14एक पाक यज्य इनकी साथ विधिया होती हैं।
03:18एक आपासना, दो स्थालीपाक, तीन वैश्वदेव, चार अश्टक, पांच मास श्राध, छे सर्पबली, साथ ईशान बली।
03:28दो हविर्यद्यत इनकी भी साथ प्रकार की विधिया होती हैं।
03:32एक अधनिहोत्र, दो दश्वपूर्णमास, तीन अग्रायन, चार चातुरमास्य, पांच पिंडपितरी यध्य, छे निरुधः पशुबंध, साथ सौतरामनी।
03:43तीन सोम्यध्य इनके साथ प्रकार होती हैं।
03:46एक अधनिष्टों, दो अध्यद्निष्टों, तीन उप्त, चार अतिरात्र, पांच आप्तोरियाम, छे बाजपे, साथ पौंदरी।
03:55यध्य के लाग यध्य से उत्पन्न ध्वावातावर्ण में थैले हुए प्रदूशन को नष्ट करके स्वच्चता लाता है।
04:05इस से अतिवरिश्टी या अनावरिश्टी जैसी समस्याएं उत्पन्न नहीं होती।
04:10इसलिए यध्य करने वाले व्यक्ती का ही नहीं, बलकि उसके घर और आसपास के क्षेत्रों का भी भला होता है।
04:18आसपास के सभी लोब लाभानवित होती हैं।
04:23फसले अच्छी तरह वुकती हैं, पशुपक्षी स्वस्त रहते हैं और संक्रामक दीमारिया नहीं फैलती।
04:30दीमारिया पास नहीं आती।
04:33इसलिए हमारे इतिहास और पुरानों में यध्य और हवन का उलेक्व बार-बार मिलता है।
04:40यज्यों की माध्यम से हानिकारक सूप्षम जीवों का नाश होता है।
04:45यज्य की अगनी से उत्पन्न भस्म का उपियोग आउश्धिया बनाने में भी किया जा सता है।
04:52यज्य की बाद शेष बची भस्म को खेटों में डालने से वह खात का काम करती है।
04:59यज्य का ध्वा हमारे अंदर की दिमारियों को ठीक करने में मदद करता है।
05:05यज्य वायूमंदल में संतुलन बनाय रखता है जिससे खेत हरे भरे रहती हैं और देश समरिध होता है।
05:14इसलिए कहा जाता है कि जहार यज्य होती हैं बहा की भस्म को आशिर्वाद स्वरूप लेना चाहिए।
05:21यज्य की घट्ती परंपरा
05:24हाल के समय में यज्य करने वाले लोग दुलब हो गए हैं।
05:29कभी कभी ही यज्य का नाम सुनने को मिलता है।
05:33लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए।
05:36यज्य से प्राप्त होने वाले लाभों को समझने की बाद हमें यज्य करने के लिए आगे आना चाहिए।
05:43कुछ लोग सोचते हैं कि यज्य करने का अर्थ पुराने राजाओं के समय में वापस जाना है,
05:49लेकिन यह गल्टफमी दूर करनी चाहिए।
05:52यज्य करने से न केवल हम बल्कि हमारे आसपास के लोग भी स्वस्त और खुशाल रहते हैं।
05:59हम मशीनों और वाहनों से उत्पन हो रहे प्रदूशन को थोड़ा कम कर सकती हैं।
06:07पुरानों के अनुसार यज्य के माध्यम से देवरिन को चुकाया जाता है।
06:12एक तरह से देवरिन चुकाना स्वयं के भले के लिए ही होता है।
06:18सभी दिव्य आत्माओं को शांती और प्रेम का आशिर्वाद।
06:23देखने और समझने के लिए धन्यवाद।
06:26लाइक करें, सब्सक्राइब करें और अपने प्रेजनों के साथ शेयर करें।
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06:41प्रसाद भारतवाज।
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