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  • 5 years ago
अलीगढ़ की छर्रा विधानसभा का सियासी हाल !
देखिए क्या होने वाला है इस सीट पर अब कमाल ?
क्या 2022 में सपा उपविजेता से बन पाएगी विजेता ?
क्या बीजेपी कर पाएगी मिशन रिपीट का सपना पूरा ?
क्या है सपा और बीजेपी की सियासी रणनीति ?
और क्या है जनता के मन का राज जो तय करेगा भविष्य ?
आज मिलेगा हर सियासी सवाल का सटीक जवाब

अलीगढ़ जिले में भी सियासी चौसर पर शह मात की बाजी लगाने की तैयारी साफ दिख रही है…और अलीगढ़ जिले की छर्रा विधानसभा पर आगामी चुनावों की दस्तक महसूस होने लगी हैं…वैसे तो इस विधानसभा पर अब तक मात्र दो ही बार चुनाव हुआ है लेकिन दोनों ही बार नतीजे चौंकाने वाले और निर्णायक रहे हैं…ऐसे में आइए जानते हैं कि इस बार का चुनाव कौन जीत सकता है और किसकी लोकप्रियता जनता के बीच में है…करेंगे तमाम मुद्दों की बात लेकिन पहले जानते हैं कि सियासी इतिहास क्या कहता है…

छर्रा विधानसभा का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है
मात्र दो बार ही ये सीट सियासी समर में दुल्हन बनी है
2012 में पहली बार इस सीट पर विधानसभा चुनाव हुआ
2012 में हुए चुनाव में इस सीट पर सपा ने बाजी मारी थी
दूसरे स्थान पर छर्रा सीट पर बीएसपी काबिज रही थी
और तीसरे स्थान पर JAKP उम्मीदवार ने टक्कर दी थी
कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार 2012 में चौथे नंबर पर थे
वहीं 2012 में बीजेपी टॉप-4 की रेस से बाहर हो गई थी
लेकिन 2017 में समीकरण फिर से बदले दिखाई दिए
सपा और बीजेपी में आमने-सामने का मुकाबला दिखाई दिया
2012 की विजेता सपा को बीजेपी ने करारी शिकस्त दी थी
जो बीजेपी 2012 में टॉप-4 में भी नहीं शामिल थी
2017 में उसी बीजेपी ने यहां जीत का परचम लहराया था

2017 में छर्रा सीट पर जीतने वाली बीजेपी इस बार संकटों से घिरी दिख रही है लेकिन बीजेपी कमजोर है ऐसा मान लेना एक दम गलत होगा क्योंकि बीजेपी मिशन रिपीट के लिए जोर आजमाइश में लगी है वहीं सपा भी 2012 वाला इतिहास दोहराने की पूरी तैयारी कर रही है…ऐसे में आइए जानते हैं कि जनता के मन मे किसके लिए प्यार है…

कोरोना काल की बदहाली ने हर गांव को चपेट में लिया है
छर्रा विधानसभा के गांवों ने भी कोरोना की मार को झेला है
इलाज की किल्लत और अस्पतालों की बदहाली कईयों को रुला गई
ऐसे में बीजेपी के खिलाफ लोगों में गुस्सा देखने को मिल रहा है
वहीं बात की जाए अन्य दलों की तो बीएसपी भी कमजोर ही दिख रही है
कांग्रेस का भी कोई खास जनाधार यहां नहीं दिखाई देता
ऐसे में ले दे कर सुई सपा और बीजेपी पर ही आकर टिक जाती है
बीजेपी से लोग नाराज हैं ऐसे में सपा के साथ हमदर्दी साफ दिखती है
लेकिन हमदर्दी को वोट में बदलने के लिए सपा को मेहनत करनी होगी
किसी जनहितकारी और लोकप्रिय नेता को मैदान में उतारना होगा
बीजेपी की तैयारियों के सामने खुद को बेहतर साबित करना होगा

सपा और बीजेपी दोनों के बीच में ही छर्रा सीट पर मुकाबला होगा लेकिन जीत किसके खाते में जाएगा वो जनता को तय करना है हमदर्दी सपा के साथ है लेकिन बीजेपी से दूरी भी ज्यादा नहीं है…ऐसे में दोनों ही दलों की मेहनत और उम्मीदवार के हिसाब से ही जनता फैसला करेगी कि किसे अपना विधायक बनाना है…फिलहाल दावों, कयासों का दौर जारी है…ब्यूरो रिपोर्ट

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