चाहे 15 अगस्त हो या 26 जनवरी या फिर राष्ट्र गौरव का कोई और पल, इन पलों में महसूस होने वाली ख़ुशी उस वक़्त अधूरी लगने लगती है, जब हमारा तिरंगा थामे हर हाथ, उसे लहराने के लिए नहीं थामे होता, बल्कि कुछ हाथों में मौजूद वह तिरंगा बिकने के लिए होता है, ताकि लोग उससे अपनी गाड़ी, घर या दफ़्तर सजा लें और कुछ लोग उन तिरंगों को बेचकर अपने घर का चूल्हा जला ले। कुछ ऐसे ही भाव हैं दामिनी यादव की इस कविता, 'बिकाऊ तिरंगे' में।
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