भावार्थ: जिनकी वासनायें अभी ज़रा कम क्षीण हुई हैं, अर्थात् जिनकी वासनायें अभी जाग्रत हैं, मजबूत हैं, उन्हें राजयोग, हठयोग के सहित करना चाहिए और जिनका चित्त परिपक्व है, वासनाहीन है, उनके लिए राजयोग अकेला ही सिद्धि देने के लिए काफ़ी है।
भावार्थ: जिनका मन पूर्णतया शुद्ध हो चुका है, उनके लिए राजयोग मात्र ही काफ़ी है। और मन की शुद्धि उनको शीघ्रता से उपलब्ध हो जाती है जोकि गुरु और ईश्वर को समर्पित होते हैं।
~ अपरोक्षानुभूति
हठयोग की क्या उपयोगिता है? अपरोक्षानुभूति को कैसे समझें? राजयोग और हठयोग में क्या अंतर है? साधना में हठयोग की क्या भूमिका होती है? क्या हठयोग सिर्फ़ शरीर के लिए ही उपयोगी है?