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  • 7 years ago
साल 89 की बात है, मैं दसवीं में था. मेरे कितने मुस्लिम दोस्त थे और कितने पंडित, इसका कोई हिसाब नहीं था. दोनों बराबर थे या पंडित ज्यादा ही रहे होंगे. मैं उनके घर जाता. उनके त्यौहारों में शामिल रहता. वो हमारे घर आते. हमारी थालियों से गस्से तोड़ते. घरों के बीच कोई दीवार नहीं थी. रोज सब्जियों, मीठे का लेनदेन चलता. उन दिनों रामायण सीरियल आया करता था. क्या हिंदू- क्या मुस्लिम, सब नहा-धोकर टीवी के सामने बैठ जाते.

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